' बिहार में वोट चोर, अभियान के एक मंच से किसी उत्साहीलाल ने प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर अच्छा नहीं किया. उस मरदूद को नहीं पता कि कोई भी गाली असभ्यता का परिचायक होती है, और इसे सप्रयास रोका जाना चाहिए. गाली-गलोच से किसी भी अभियान की पवित्रता नष्ट होती है. गाली चाहे आम कार्यकर्त्ता दे या कोई पंत प्रधान इसे निंदनीय ही कहा जाएगा.
भारतीय राजनीति में गालियों का चलन नया -नया है, कोई एक दशक पुराना. मैने तब भी इस अभियान की निंदा की थी, लेकिन गालियों की जितनी निंदा की गई, उनका प्रचलन उतना ही ज्यादा बढ गया. गालियां दरअसल सबल का अहंकार और निर्बल का हथियार होती हैं.
हमारे बुंदेलखंड में तो सरस गालियां संस्कृति का अभिन्न अंग है. विवाह के मौके पर महिलाएं यदि बारातियों को लय ताल में गालियां न सुनाएं तो बुरा माना जाता है. बाराती गालियां सुनकर महिलाओं को नेग देते हैं.गालियां वरपक्ष के सगे-संबंधियों को नाम सहित दी जाती थीं.मुझे याद है जब मैं बच्चा था तब अपनी मां को गालियां गाते सुनकर आपे से बाहर हो गया था. लेकिन जब बडा हुआ तो मुझे गालियों का महत्व और लालित्य समझ में आया.
राजनीति में गालियां संस्कृति नहीं बल्कि असभ्यता का परिचायक हैं. इनका श्रीगणेश किसने किया और कब किया ये मैं नहीं बता सकता. किंतु अपनी याददाश्त पर जोर डालता हूं तो लगता है कि राजनीति में गालियां 2014 के पहले चलन में शायद नहीं थीं. तब भी किसी ने श्रीमती इंदिरा गांधी को गाली नहीं दी जब उन्होने इमरजेंसी लगाई या आपरेशन ब्लू स्टार किया. इंदिरा जी को गालियों से नहीं बल्कि गोलियों से मारा गया.
बात प्रधानमंत्री को माँ की गाली देने की है. प्रधानमंत्री का इस गाली से कुछ नहीं बिगडने वाला. वे तो गालियों को शक्तिवर्धक रसायन मानते हैं. वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उन्हे रोज दो- तीन किलो गालियां मिलती हैं और इनसे उनकी सेहत और अच्छी होती है. प्रधानमंत्री के इस कथन का किसी मूर्ख, अज्ञानी, औघड ने गलत मतलब लगा लिया शायद. लेकिन उस मूढ ने प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर विपक्ष के अच्छे - खासे वोट अधिकार अभियान का नुकसान कर दिया. गाली देने वाला किस दल का था ये मायने नही रखता. मायने ये रखता है कि उसने किस मंच से गाली दी.
गाली देने के अपराध के लिए न भादंसं में कोई कडी सजा का प्रावधान था न भारतीय न्याय संहिता में कोई प्रावधान है. गाली देने वाले के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट भी लिख ली है. लेकिन जब तक पुलिस गाली देने वाले को खोजेगी, गिरफ्तार करेगी, आरोप पत्र बनाकर अदालत में दायर करेगी, तब तक बिहार विधानसभा के चुनाव भी हो जाएंगे.
मै कहना चाहता हूँ कि वोट अधिकार यात्रा के मंचों पर भाषण देते समय लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी भी आपा खो रहे हैं. वे प्रधानमंत्री के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वो भाषा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी फौज के लिए तो ठीक हो सकती है किंतु राहुल के लिए बिल्कुल नहीं. मैने राहुल गांधी के नाना पंडित जवाहरलाल नेहरु को, उनके दादा फिरोज गांधी को, उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी को और उनके पिता राजीव गांधी को भाषण देते सुना है और मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि राहुल गांधी ने अपने परिवार की शालीनता से पगी भाषण शैली का इस्तेमाल नहीं किया. वे उत्तेजना में आपा खो रहे हैं.
राहुल गांधी को याद रखना पडेगा कि गाली का जबाब गाली नहीं हो सकती. यदि किसी ने उनकी मां को 'जर्सी गाय ' कहा तो कहा, 'वारवाला' कहा तो कहा,. किसी ने मोदी जी के मुरीद शशि धरूर की पत्नी को 'पांच करोड की गर्लफ्रैड' कहा तो कहा. किसी ने किसी महिला सांसद की हंसी को 'सूर्पणखा की हंसी 'कहा तो जनता ने उन्हे दंडित किया. चार सौ तो छोडिए तीन सौ पार नहीं करने दिया और 240 सीटों पर रोक दिया.
जनता सब कुछ जानती है. कौन घटिया राजनीति कर रहा है,? कौन भाषा की शालीनता भंग कर रहा है? कौन देश की अस्मिता को मिट्टी में मिला रहा है? जनता प्रधानमंत्री को भी सुनती है और लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी. सडक पर भी सुनती है और संसद में भी. इसलिए ये एहतियात बरतना बहुत जरूरी है कि "लरजें न कदम, कोई जुबां बेअदब न हो "नेताओं को हर तरह की उत्तेजना से परहेज करना चाहिए. अन्यथा राहुल बाबा आपके सब किए-धरे पर पानी फिर जाएगा, क्योंकि ' मोदी एंड संस ' तो फिलहाल सत्ता छोडने के मूड में नहीं है्.संघ के सरसंघ चालक माननीय डॉ मोहन भागवत भी इसकी ताईद कर चुके हैं.
@राकेश अचल
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