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शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

डॉ. भगवत सहाय महाविद्यालय में विकास कार्यों का हुआ लोकार्पण

ग्वालियर  । वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी उज्ज्वल हो, इसी ध्येय के साथ सरकार शिक्षा सुविधाओं का विस्तार कर रही है। इसी भाव के साथ उप नगर ग्वालियर के अंतर्गत शिक्षण संस्थाओं को अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है। यह बात ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने डॉ. भगवत सहाय शासकीय महाविद्यालय में विकास कार्यों के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने महाविद्यालय में कुल 4 करोड़ 15 लाख रूपए की लागत से नवनिर्मित मुख्य प्रवेश द्वार, अत्याधुनिक विज्ञान भवन, कम्प्यूटर प्रयोगशाला एवं स्मार्ट क्लास का लोकार्पण किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भाजपा जिला अध्यक्ष श्री जयप्रकाश राजौरिया ने की। 

ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर सहित अन्य अतिथियों ने शॉल-श्रीफल व पुष्पाहारों से डॉ. भगवत सहाय महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आर के श्रीवास्तव को सम्मानित किया। डॉ. श्रीवास्तव इसी माह 30 अगस्त को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। सभी अतिथियों ने डॉ. श्रीवास्तव के सेवाकाल को याद किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। 

तैराकी प्रतियोगिता में खिलाड़ियों ने किया शानदार प्रदर्शन

नगर निगम ने किया प्रतियोगिता का आयोजन 

ग्वालियर  ।  खिलाडी खेल भावना से खेलते हुये लक्ष्य को हासिल करें और अपने सर्वश्रेष्ठ खेल का प्रदर्शन करें। नगर निगम ग्वालियर द्वारा निरंतर खेलों को बढावा देने के लिए विभिन्न वर्गों की खेल प्रतियोगिताओं को आयोजन किया जा रहा है। हमारा उद्देश्य है कि शहर से अधिक से अधिक प्रतिभावान खिलाड़ी देश एवं विश्व में ग्वालियर का नाम रोशन करें। उक्ताशय के विचार महापौर डॉ. शोभा सतीश सिंह सिकरवार ने राष्ट्रीय खेल दिवस के उपलक्ष्य में नगर निगम द्वारा आयोजित जिला स्तरीय तैराकी प्रतियोगिता के शुभारंभ अवसर पर व्यक्त किए। 

कार्यक्रम में अतिथियों द्वारा खिलाड़ियों व जिला तैराकी संघ के तकनीकी सदस्यों का परिचय प्राप्त किया तदोपरान्त रंगीन गुब्बारे छोड़कर प्रतियोगिता का शुभारम्भ किया तथा इस अवसर पर विजयी खिलाड़ियों को मेडल सर्टिफिकेट व पुरस्कार देकर पुरस्कृत किया। नगर निगम, ग्वालियर एवं जिला तैराकी टीम के मध्य मैत्रीपूर्ण वाटरपोलो का मैच भी खेला गया जिसमें नगर निगम, ग्वालियर 2-1 से विजयी रही। प्रतियोगिता की ओवरऑल चौम्पीयनशिप विधा भवन स्कूल की रही एवं द्वितीय व तृतीय स्थान एल.ए.एच.एस. एवं भारतीय कर रहा। तैराकी प्रतियोगिता में 10 वर्ष की कैटेगरी में 50 मीटर फ्रीस्टाइल के गु्रप में वीर भारद्वाज प्रथम, आरव गोयल द्वितीय एवं गौरांग तिवारी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। इसी कैटेगरी में गर्ल्स ग्रुप में अविष्का अग्रवाल ने प्रथम, डिम्पल कंवर ने द्वितीय, कामाख्या गुप्ता ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। इसके ही विभिन्न श्रेणियों में अलग अलग कैटेगरी में आयोजित बॉयज एवं गर्ल्स समूह में प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। जिसमें विजयी खिलाडियों को मेडल प्रदान किए गए तथा सभी प्रतिभागी खिलाड़ियों को सर्टिफिकेट दिए गए। 

कब होगी राजनीति में गाली-गलौच अक्षम्य?

' बिहार में वोट चोर,  अभियान के एक मंच से किसी उत्साहीलाल ने प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर अच्छा नहीं किया. उस मरदूद को नहीं पता कि कोई भी गाली असभ्यता का परिचायक होती है, और इसे सप्रयास रोका जाना चाहिए. गाली-गलोच से किसी भी अभियान की पवित्रता नष्ट होती है. गाली चाहे आम कार्यकर्त्ता दे या कोई पंत प्रधान इसे निंदनीय ही कहा जाएगा. 

भारतीय राजनीति में गालियों का चलन नया -नया है, कोई एक दशक पुराना. मैने तब भी इस अभियान की निंदा की थी, लेकिन गालियों की जितनी निंदा की गई, उनका प्रचलन उतना ही ज्यादा बढ गया. गालियां दरअसल सबल का अहंकार और निर्बल का हथियार होती हैं. 

हमारे बुंदेलखंड में तो सरस गालियां संस्कृति का अभिन्न अंग है. विवाह के मौके पर महिलाएं यदि बारातियों को लय ताल में गालियां न सुनाएं तो बुरा माना जाता है. बाराती गालियां सुनकर महिलाओं को नेग देते हैं.गालियां वरपक्ष के सगे-संबंधियों को नाम सहित दी जाती थीं.मुझे याद है जब मैं बच्चा था तब अपनी मां को गालियां गाते सुनकर आपे से बाहर हो गया था. लेकिन जब बडा हुआ तो मुझे गालियों का महत्व और लालित्य समझ में आया.

राजनीति में गालियां संस्कृति नहीं बल्कि असभ्यता का परिचायक हैं. इनका श्रीगणेश किसने किया और कब किया ये मैं नहीं बता सकता. किंतु अपनी याददाश्त पर जोर डालता हूं तो लगता है कि राजनीति में गालियां 2014 के पहले चलन में शायद नहीं थीं. तब भी किसी ने श्रीमती इंदिरा गांधी को गाली नहीं दी जब उन्होने इमरजेंसी लगाई या आपरेशन ब्लू स्टार किया. इंदिरा जी को गालियों से नहीं बल्कि गोलियों से मारा गया.

बात प्रधानमंत्री को माँ की गाली देने की है. प्रधानमंत्री का इस गाली से कुछ नहीं बिगडने वाला. वे तो गालियों को शक्तिवर्धक रसायन मानते हैं. वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उन्हे रोज दो- तीन किलो गालियां मिलती हैं और इनसे उनकी सेहत और अच्छी होती है. प्रधानमंत्री के इस कथन का किसी मूर्ख, अज्ञानी, औघड ने गलत मतलब लगा लिया शायद. लेकिन उस मूढ ने प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर विपक्ष के अच्छे - खासे वोट अधिकार अभियान का नुकसान कर दिया. गाली देने वाला किस दल का था ये मायने नही रखता. मायने ये रखता है कि उसने किस मंच से गाली दी.

गाली देने के अपराध के लिए न भादंसं में कोई कडी सजा का प्रावधान था न भारतीय न्याय संहिता में कोई प्रावधान है. गाली देने वाले के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट भी लिख ली है. लेकिन जब तक पुलिस गाली देने वाले को खोजेगी, गिरफ्तार करेगी, आरोप पत्र बनाकर अदालत में दायर करेगी, तब तक बिहार विधानसभा के चुनाव भी हो जाएंगे.

मै कहना चाहता हूँ कि वोट अधिकार यात्रा के मंचों पर भाषण देते समय लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी भी आपा खो रहे हैं. वे प्रधानमंत्री के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वो भाषा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी फौज के लिए तो ठीक हो सकती है किंतु राहुल के लिए बिल्कुल नहीं. मैने राहुल गांधी के नाना पंडित जवाहरलाल नेहरु को, उनके दादा फिरोज गांधी को, उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी को और उनके पिता राजीव गांधी को भाषण देते सुना है और मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि राहुल गांधी ने अपने परिवार की शालीनता से पगी भाषण शैली का इस्तेमाल नहीं किया. वे उत्तेजना में आपा खो रहे हैं.

राहुल गांधी को याद रखना पडेगा कि गाली का जबाब गाली नहीं हो सकती. यदि किसी ने उनकी मां को 'जर्सी गाय ' कहा तो कहा, 'वारवाला' कहा तो कहा,. किसी ने मोदी जी के मुरीद शशि धरूर की पत्नी को 'पांच करोड की गर्लफ्रैड' कहा तो कहा. किसी ने किसी महिला सांसद की हंसी को 'सूर्पणखा की हंसी 'कहा तो जनता ने उन्हे दंडित किया. चार सौ तो छोडिए तीन सौ पार नहीं करने दिया और 240 सीटों पर रोक दिया.

जनता सब कुछ जानती है. कौन घटिया राजनीति कर रहा है,? कौन भाषा की शालीनता भंग कर रहा है? कौन देश की अस्मिता को मिट्टी में मिला रहा है? जनता प्रधानमंत्री को भी सुनती है और लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी. सडक पर भी सुनती है और संसद में भी. इसलिए ये एहतियात बरतना बहुत जरूरी है कि "लरजें न कदम, कोई जुबां बेअदब न हो "नेताओं को हर तरह की उत्तेजना से परहेज करना चाहिए. अन्यथा राहुल बाबा आपके सब किए-धरे पर पानी फिर जाएगा, क्योंकि ' मोदी एंड संस ' तो फिलहाल सत्ता छोडने के मूड में नहीं है्.संघ के सरसंघ चालक माननीय डॉ मोहन भागवत भी इसकी ताईद कर चुके हैं.

@राकेश अचल

गुरुवार, 28 अगस्त 2025

मप्र में अब कभी भी पिट सकते हैं कलेक्टर

 डबल इंजन लगाकर चल रहे मप्र में 55 जिलों के कलेक्टर परेशान हैं, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सूबे में कब, किस जिले के कलेक्टर को सत्तारूढ दल का विधायक पीट दे.भिंड कलेक्टर संजीव श्रीवास्तव ने बीजेपी विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाहा को उंगली दिखाई, तो विधायक ने भी कलेक्टर के मुंह पर मुक्का तान दिया. सुरक्षा बल के जवान यदि बीच में न आते तो कलेक्टर का पिटना तय था.

मप्र मे 2003 से 19 महीनों को छोड भाजपा की ही सरकार है. यानि भाजपा मप्र में दो दशक से सत्तारूढ है. 2018 में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बेदखल किया था किंतु भाजपा 19 महिने बाद ही बिना चुनाव लडे फिर सत्ता में आ गई थी क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने  भाजपा से सौदेबाजी कर कांग्रेस का तख्ता पलट करा दिया था.

लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण भाजपा के विधायक, सांसद, जिलाध्यक्ष किसी को कुछ समझतै ही नहीं है. जिलों के कलेक्टर और एसपी भाजपा फदाधिकारियों के आगे हाथ बांधे खडे रहते है. इस लंबे समय ने मुख्यमंत्रियों ने प्रशासन प्रमोटी आईएएस और आईपीएस से चलवाने की परंपरा डाल दी. प्रमोटी अधिकारी खेले- खाए होते हैं और उनमें सीधी भर्ती के नौकरशाहों जैसी अकड भी नहीं होती. वे जी हजूरी करने में भी दक्ष होते हैं.इस समय प्रदेश के आधे से ज्यादा जिलों में प्रमोटी अधिकारी कलेक्टर और एसपी हैं. भिंड में स्थिति उल्टी है. इसीलिए यहाँ विधायक ने कलेक्टर पर मुक्का तानने की हिमाकत की.

इससे पहले ग्वालियर में आईएएस निगमायुक्त के साथ भी सत्तारूढ दल के लोग अभद्रता कर चुके है.भिंड विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह अपने समर्थकों के साथ कलेक्टर के बंगले पर पहुंचे थे. पहले विधायक और उनके समर्थक बाहर नारेबाजी करते रहे. फिर विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाहा ने समर्थकों के साथ मिलकर कलेक्टर के बंगले के दरवाजे को जोरदार धक्का देकर खोल दिया.

दरवाजा खुलते ही सामने शॉल ओढ़े हुए कलेक्टर संजीव श्रीवास्तव खड़े नजर आए. विधायक के इस रवैए को देखकर कलेक्टर ने विधायक को उंगली दिखा दी. कलेक्टर की उंगली देखकर विधायक इतना आग बबूला हो गए कि उन्होंने कलेक्टर को मारने के लिए मुक्का तान दिया.इससे पहले कि कलेक्टर और विधायक आपस में उलझते, वहां मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने बीच बचाव कर दिया. लेकिन बात यही नहीं थमी. इस उंगली और मुक्का के बीच कलेक्टर ने विधायक से कह दिया, ''चोरी नहीं चलने दूंगा.'' तो पलटकर विधायक ने कलेक्टर से कहा , ''सबसे बड़ा चोर तो तू है.'' विधायक के यह कहते ही वहां मौजूद विधायक के समर्थकों ने 'भिंड कलेक्टर चोर' है के नारे लगाना शुरू कर दिए.


कलेक्टर और विधायक के बीच बहस बाजी हुई तो, सुरक्षाकर्मियों ने बीच बचाव किया. कलेक्टर को तो बंगले के अंदर कर दिया गया, लेकिन बाहर विधायक ने हंगामा शुरू कर दिया. विधायक के समर्थक जमकर नारेबाजी करते रहे और खुद विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाहा जमकर अपनी नाराजगी बड़बड़ाते हुए निकालते रहे. 

हंगामे की खबर जैसे ही पुलिस अधिकारियों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को लगी तो, एडीएम एलके पांडे समेत पुलिस के अन्य अधिकारी कलेक्टर बंगले पर पहुंच गए. यहां विधायक को मनाने की कोशिश की गई, लेकिन वह नहीं माने. इसके बाद बात ऊपर तक पहुंची. प्रभारी मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने खुद विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाहा से बात की. जिसके बाद विधायक का गुस्सा शांत हुआ और विधायक कलेक्टर बंगले से वापस चले गए.कलेक्टर भी शुरू से विवादास्पद है. अदालत ने इनको फील्ड में तैनात न करने की हिदायत दी थी. पूर्व गृहमंत्री डॉ गोविन्द सिंह भी कलेक्टर की शिकायत कर चुके हैं.

मध्यप्रदेश में नौकरशाही और जन प्रतिनिधियों के बीच ये इकलौता मामला नही है. इससे पहले शिवपुरी जिले के भाजपा विधायक प्रीतम लोधी शिवपुरी एसपी  से जूझ चुके हैं. गुना और अशोकनगर में भी टकराव की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं. देवास में भाजपा विधायक के बेटे के सामने पुलिस हाथ जोडे खडी रही, जबकि उसने आधी रात को एक मंदिर के दरवाजे खुलवा दिए थे.

मप्र में दरअसल प्रशासन का पूरी तरह से भगवाकरण हो चुका है. ज्यादातर कलेक्टर भाजपा पदाधिकारी की तरह काम कर रहे हैं क्योंकि वे असुरक्षा भाव से घिरे हैं.  सबको पता है कि वक्त पडने पर सरकार नौकरशाही को संरक्षण नहीं देगी,उल्टे उनका तबादला और कर दिया जाएगा.नौकरशाहों को अंधभक्त बनाने का श्रीगणेश तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समय शुरू हुआ था. इस परंपरा को उपयोगी मानकर आज के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी इसे आगे बढा रहे हैं.

आपको बता दूं कि मध्य प्रदेश में आईएएस के कुल स्वीकृत पद 459 हैं।इनमें से 393 अधिकारी वर्तमान में सेवा में हैं,  66 पद रिक्त हैं।

@ राकेश अचल

बुधवार, 27 अगस्त 2025

अमेरिकी टैरिफ वार का श्रीगणेश, बचाव स्वदेशी से होगा?


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क  का श्रीगणेश आज बुधवार  से लागू हो रहा है। आज से ही देश में श्रीगणेशोत्सव भी आरंभ हो रहा है. भारत अमेरिका के इस आर्थिक हमले का मुकाबला स्वदेशी के नारे के साथ करने जा रहा है. इस हिसाब से ये भारत के लिए इस दशक की कहिए या मोदी युग की शायद पहली और आखिरी अग्नि परीक्षा है.

 आपको बता दूं कि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के प्रिय मित्र अमेरिका  के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गया कुल टैरिफ 50 फीसदी पर पहुंच गया है, जो दुनिया में किसी भी देश की तुलना में सबसे ज्यादा है।  यह टैरिफ भारत के लगभग 48 अरब डॉलर के निर्यात को प्रभावित करेगा।  अब इसका सबसे ज्यादा असर कपड़ा क्षेत्र पर नजर आ रहा है।  ताजा खबर है कि देश के कई बड़े शहरों में कपड़ा उत्पादन रोक दिया गया है।

 मोदीजी के मित्र ट्रंप साहब अचानक मोदीजी और भारत के शत्रु कैसे बन गए ये हकीकत केवल मोदीजी और डोनाल्ड ट्रंप साहब जानते हैं.ट्रंप ने भारत पर शुरुआत में 25 प्रतिशत शुल्क लगाया था और साथ ही रूसी तेल खरीदने को लेकर जुर्माना भी थोपा था। खास बात है कि भारत के अलावा सिर्फ ब्राजील ही है, जिसपर इतना भारी टैरिफ लगाया गया है।भारत और ब्राजील उस ब्रिक्स के संस्थापक सदस्य हैं जो अमेरिका की आंख की किरकिरी बना हुआ है.

 फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स के अध्यक्ष एससी राल्हान के मुताबिक , 'बढ़ती लागत प्रतिस्पर्धा के बीच कपड़ा उत्पादकों ने तिरुपुर, नोएडा और सूरत में उत्पादन रोक दिया है। यह क्षेत्र वियतनाम और बांग्लादेश के कम लागत वाले प्रतिद्वंदियों के सामने पिछड़ रहा है। कपडा उद्योग के बाद सबसे बडा संकट सीफूड पर है. सीफूड में खासतौर से झींगा है.अब जब अमेरिका ही भारतीय सीफूड एक्सपोर्ट का करीब 40 फीसदी हिस्सा लेता है तो भंडार में कमी, सप्लाई चेन में परेशानी और किसानों की तकलीफ जैसे कई जोखिम और बढ़ गए हैं।'

अमेरिका के टैरिफ हमले के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ब्राजील की तरह विरोध का एक शब्द न संसद में बोला और न संसद के बाहर लेकिन राल्हान जैसे लोग बोल उठे हैं. राल्हान ने कहा कि 50 फीसदी टैरिफ से अपने सबसे बड़े निर्यात बाजार में भारतीय सामान पर गंभीर असर होगा। उन्होंने कहा कि इसके चलते अमेरिका जाने वाले भारतीय सामान को भी भारी झटका लग सकता है। उन्होंने कहा कि चीन, वियतनाम, कंबोडिया, फिलिपींस और दक्षिण पूर्व और दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में भारतीय सामान प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गया है।

राल्हान ही नहीं बल्कि कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने कहा है कि कपड़ा उत्पादक सरकार की तरफ से राहत मिलने की राह देख रहे हैं। सीआईटीआई अध्यक्ष राकेश मेहरा ने कहा, 'सरकार इंडस्ट्री से बात कर रही है कि कैसे वह इस समय हमारी मदद कर सकती है, लेकिन हालात की गंभीरता के मद्देनजर हम चाहते हैं कि वित्तीय मदद के जरिए मजबूत समर्थ मिले और कच्चे सामान की उपलब्धता के मामले में नीति स्तर पर जल्द फैसले लिए जाएं।'

खबर है कि भारत और अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने असैन्य परमाणु सहयोग को मजबूत करने सहित व्यापार और निवेश, महत्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की है। ‘टू प्लस टू’ अंतरसत्रीय वार्ता के ढांचे के तहत सोमवार को डिजिटल तरीके से हुई वार्ता व्यापार और शुल्क पर ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव की पृष्ठभूमि में हुई. लेकिन अभी तक अमेरिका पिघला नहीं है.

जिस दिन भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी सरकार की तरफ 50 फीसद का अतिरिक्त टैक्स लगने वाला है, उस दिन पीएम नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर स्वदेशी और मेक इन इंडिया को आगे बढ़ाने की जोरदार वकालत की है। लेकिन उन्होने ये नहीं बताया कि भारत ने अमेरिका की हेंकडी से निबटने के लिए क्या तैयारी की है. आपको बता दें कि भारत की विदेशनीति का हिंदूकरण करने के फेर में हमारी सरकार गच्चा खा गई और अब प्रधानमंत्री आक्रामक होने के बजाय बचाव की मुद्रा में चीन और रूस की बैशाखियां लगाकर खडे रहने की कोशिश कर रहे हैं. माननीय मोदी जी की ये कोशिश अमेरिका के लिए आग में घी का काम कर रहीं है. इससे संकट कम होने के बजाय और बढने की आशंका है.

पूरा देश मोदीजी की नाकामियों के बावजूद संकट की इस घडी में मोदी जी के स्वदेशी के मंत्र का जाप करना चाहता है लेकिन भारत के बाजार तो चीनी उत्पादों से अटे पडे हैं. स्वदेशी के लिए बाजार में जगह ही कहाँ बची है. भगवान गणेश जी ही अब देश को अमेरिका के इस प्रतिबंधात्मक हमले से बचा सकते हैं.

मजे की बात ये है कि ट्रंप अभी भी मोदी जी के मुरीद हैं.समाचार एजेंसी एएनआई की तरफ जारी वीडियो में डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में रक्षा मंत्री पीट हेक्सेथ के साथ बैठे दिख रहे ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘शानदार व्यक्ति’ बताते हुए कहा कि उन्होंने उन्हें फोन कर साफ शब्दों में कहा था कि अगर हालात नहीं सुधरे तो अमेरिका भारत पर ट्रेड बैन और भारी टैरिफ लगाएगा.

@ राकेश अचल

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

सिंधिया कन्या विद्यालय में पोलैंड के राजनयिक डॉ. पिओत्र ए. स्वितल्स्की का गरिमामयी आगमन

रविकांत दुबे जिला प्रमुख आपके द्वार न्यूज 


 ग्वालियर ।सिंधिया कन्या विद्यालय में 25 अगस्त  को प्रात: काल *एम्बेसी ऑफ़ द रिपब्लिक ऑफ़ पोलैंड डॉ. पियोत्र ए. स्वितल्स्की, सुश्री मार्ता कुशनिएर्स्का, और श्री अरुणांश गोस्वामी का आगमन हुआ। पियोत्र ए. स्वितल्स्की पूर्व में डेप्युटी फॉरेन मिनिस्टर ऑफ़ पोलैंड ,एम्बेसडर ऑफ़ यूरोपियन यूनियन  टू अर्मेनिआ, परमानेंट रिप्रेजेन्टेटिव ऑफ़ पोलैंड टू द कौंसिल ऑफ़ यूरोप , डायरेक्टर फॉर पालिसी प्लानिंग कौंसिल ऑफ़ यूरोप सेक्रेटेरिएट,डायरेक्टर फॉर पालिसी प्लानिंग एट द पोलिश फॉरेन मिनिस्ट्री फॉर एशिया एंड द डायरेक्टर इन द एम.एफ.ए डिप्लोमेटिक एडवाइजर टू द ओ.एस.सी.ई के  सेक्रेटरी* जनरल रह चुके हैं। मीडिया प्रभारी श्रीमती वैशाली श्रीवास्तव ने बताया कि प्रधानाचार्या श्रीमती निशि मिश्रा द्वारा डॉ. स्वितल्स्की, सुश्री मार्ता कुशनिएर्स्का, और श्री अरुणांश गोस्वामी* का पुष्पगुच्छों से हार्दिक स्वागत किया गया तथा स्मृति चिह्न प्रदान किए गए। इस अवसर पर *कोऑर्डिनेटर के रूप में करियर काउंसलर सुश्री उर्वशी पांडे* विशेष रूप से उपस्थित रहीं।

 *डॉ. स्वितल्स्की* को विद्यालय परिसर का भ्रमण किया, जिसके दौरान उन्होंने संस्थान की विविध अभिनव पहलों का अवलोकन किया और उनके सामाजिक प्रभाव की सराहना की। प्रमुख पहलों में ‘ *संकल्प* ’—ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने हेतु समर्पित सैनिटरी पैड निर्माण परियोजना को देखा  तथा विद्यालय की छात्राओं के प्रयासों की सरहाना की  इसके उपरांत *डॉ. स्वितल्स्की* ने विद्यालय के *रोबोटिक्स लैब* का भ्रमण किया, जहाँ उन्होंने छात्राओं द्वारा निर्मित रोबोट का अवलोकन किया और उनकी तकनीकी दक्षता व नवाचार क्षमता की सराहना की । इसके बाद उन्होंने वेस्टर्न म्यूज़िक कक्ष  , नृत्य कक्ष ,तबला कक्ष, इंडियन म्यूजिक कक्ष का दौरा किया। *डॉ. स्वितल्स्की* ने छात्राओं की सामूहिक प्रतिभा, रचनात्मकता और सांस्कृतिक समर्पण की सराहना करते हुए विद्यालय की शैक्षिक और सह-पाठ्यक्रमीय उत्कृष्टता की प्रशंसा की। सभी प्रयासों को देखकर *डॉ. स्वितल्स्की ने* विद्यालय की नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और स्थिरता की भावना की सराहना की, जो शिक्षार्थियों को न केवल अकादमिक रूप से, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी समृद्ध बना रही हैं।

   डॉ. स्वितल्स्की ने कक्षा ग्यारहवीं और बारहवीं के छात्राओं के साथ इंटरैक्टिव सेशन किया  उन्होंने अपने विशिष्ट करियर के अनुभव से, एक एम्बेसडर के जीवन को परिभाषित करने वाली चुनौतियों और अवसरों के बारे में गहन अंतर्दृष्टि साझा की। उन्होंने छात्राओं को उनके अच्छे करियर के लिए प्रेरित किया करियर बनाते समय आने वाली चुनौतियों से आगाह  किया  उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की ।  

 *सत्र का समापन एक रोचक प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ,* जहाँ छात्रों ने उनके अनुभवों और दृष्टिकोणों को और गहराई से समझने के लिए विचारोत्तेजक प्रश्न पूछे। पहला सवाल यह था कि उनकी डिप्लोमा डिग्री में सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या था? उन्होंने उत्तर दिया कि जब नए पोलैंड का जन्म 1999 में हुआ था, तब उन्हें पूरे देश को नए सिरे से डिज़ाइन करना पड़ा।

दूसरा प्रश्न यह था कि भारत और पोलैंड के युवा, दोनों देशों के बीच संबंधों को कैसे मज़बूत कर सकते हैं? उन्होंने इसका उत्तर "एक विश्व, एक परिवार और एक भविष्य" का नारा देकर दिया। उन्होंने कहा कि युवा सबसे अच्छे और सबसे मज़बूत एजेंट होते हैं।

 इस आदान-प्रदान ने छात्राओं को प्रेरित किया और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तथा एक बेहतर विश्व के निर्माण के बारे में उनकी समझ को व्यापक बनाया। डॉ. पिओत्र *ए. स्वितल्स्की* की यात्रा सिंधिया कन्या विद्यालय के लिए सम्मान की बात थी ।


 

खाटू श्याम मंदिर राधा की हवेली का वार्षिकोत्सव 28 से

रविकांत दुबे जिला प्रमुख आपके द्वार न्यूज

ग्वालियर। खाटू श्याम मंदिर राधा की हवेली बाई साहब की परेड पर मंदिर का 14वां वार्षिक महोत्सव विभिन्न आयोजनों के साथ मनेगा। इस मौके पर श्याम बाबा की रथयात्रा भी निकाली जायेगी। महोत्सव में भारी संख्या में श्याम प्रेमियों की उपस्थिति रहेगी। यह जानकारी मंगलवार को खाटू श्याम मंदिर के मुख्य भक्त राजू रैनवाल व श्याम सरकार उत्सव समिति के गोपाल अग्रवाल ने संयुक्त रूप से पत्रकारवार्ता में दी।

पत्रकारों से चर्चा करते हुये राजू रैनवाल और गोपाल अग्रवाल ने बताया कि 28 अगस्त से 4 सितंबर तक वार्षिक महोत्सव मनेगा। इसकी शोभायात्रा 28 अगस्त को प्रातः 9.30 बजे रोकडिया हनुमान मंदिर से शुरू होगी। इसमें बाबा भोलेनाथ की पालकी भी विशेष आकर्षण का केन्द्र होगी। शोभायात्रा सराफा बाजार, पाटनकर बाजार, दौलतगंज, महाराजबाड़ा, माधवगंज, स्काउट से बाड़ा, जनकगंज, हनुमान चैराहा होते हुये लक्ष्मीगंज से मंदिर स्थल पर पहुंचेगी। यात्रा का जगह जगह श्याम प्रेमी स्वागत भी करेंगे। उन्होंने बताया कि महोत्सव में 29 अगस्त से शिवपुराण कथा का वाचन वृंदावन से पंडितसतीश कौशिक महाराज द्वारा किया जायेगा। कथा के लिये सुबह 9 बजे कलथ यात्रा भी निकलेगी। इस दौरान मंदिर परिसर में एक निशुल्क ज्योतिष शिविर नवग्रह कथावाचक एवं ज्योतिषाचार्य पंडित पंकज कृष्ण शास्त्री द्वारा किया जायेगा।

 3 सितंबर को एकादशी पर मंदिर परिसर में कथा सुनाई जायेगी। वहीं रात्रि को ज्योत कीर्तन स्थानीय कलाकारों द्वारा किया जायेगी। 4 सितंबर को विशाल कीर्तन सायं 7 से सुबह 4 बजे तक होगा। कीर्तन में मुंबई से अधिष्ठा अनुष्का बहनें, वृंदावन से खुशबू राधा एवं जयपुर से आयुष सोमानी के साथ गाजियाबाद से सांवरिया म्यूजिक ग्रुप अपनी प्रस्तुति देंगे। कार्यक्रम की शुरूआत शिरीष गुडडू भैया द्वारा गणेश वंदना के साथ की जायेगी। इसके बाद सबलगढ़ के मंगल बप्पा अपने भजन रखेंगे। पत्रकारवार्ता में श्याम सरकार उत्सव समिति के दिनेश शर्मा, अभिमन्यु चौहान , तरूण बंसल, उमेश गर्ग, संदेश बंसल, शिरीष गुप्ता गुडडू भैया भी उपस्थित थे। 

महाराज को लेकर आचार्य और शंकराचार्य में वाकयुद्ध , ज्ञान को लेकर आपस में उलझे

 



दिग्विजय सिंह का झूठ भी सच और सच भी झूठ है

 

मप्र के पू्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी राजा को सुर्खियों में रहना खूब आता है. इन दिनों जब कांग्रेस हाईकमान मप्र में नये सिरे से संगठन सृजन में लगा है तब खुद को हासिये पर जाता देख दिग्विजय सिंह ने पांच साल पुराना विवादों का गडा मुर्दा उखाडकर खुद को सियासी सुर्खी बना लिया. मुद्दा है पांच साल पहले कांग्रेस की सरकार गिराकर भाजपा के दत्तक पुत्र बन चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया  और दिग्विजय की भूमिका का.

ग्वालियर के सिंधिया और राघौगढ़ के खीची घराने की अदावत तबकी है जब भारत आजाद नहीं था. तब कांग्रेस भी नहीं थी. राघौगढ में दिग्विजय के पुरखे राज करते थे और ग्वालियर में ज्योतिरादित्य के. चार-पांच पीढी पहले की अदावद मुसलसल जारी है. पुरानी अदावत के दस्तावेजी साक्ष्य हैं लेकिन 1971 से 2025 तक की अदावत का चश्मदीद मैं खुद हूँ. दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया से अदावत निभाई और बाद में उनके असमय निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी अदालत निभा रहे हैं. लेकिन दोनों परिवारों के बीच अदावत के बावजूद गजब की  खानदानी शालीनता है.

आप शायद यकीन न करें और मुमकिन है कि अवसर आने पर खुद दिग्विजय सिंह इसे झूठ और बकवास बता दें लेकिन मैने ज्योतिरादित्य की दादी राजमाता के निधन के बाद माधवराव सिंधिया की पगडी रस्म में और  माधवराव सिंधिया के निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की पगडी रस्म में दिग्विजय सिंह को वे सब रीति रिवाज़ निभाते देखा है जो अब धीरे - धीरे दुर्लभ हो रहे हैं. इनमें एक राजा का एक महाराजा के सामने मुजरा करना और नेग देना शामिल है.

मैने ये उल्लेख इसलिए किया क्योंकि जब भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को 2019 के लोकसभा चुनाव में घेरकर हरा दिया गया था तब राघोगढ़ में जश्न मना था. ज्योतिरादित्य चाहते थे कि मप्र से उन्हे पहली प्राथमिकता वाली राज्यसभा सीट से प्रत्याशी बनाया जाए लेकिन दिग्विजय सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ से गठजोड कर ये सीट हडप ली. यदि उनके मन में ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति रत्ती भर भी प्रेम होता तो वे ये सीट लेते ही नहीं. लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने मिलकर सिंधिया से पुरानी अदावत भुना कर ही दम लिया स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में शामिल होने के बाद गांधी परिवार में कमलनाथ की धमक कुछ कम हो गई थी. कमलनाथ संजयगांधी के प्रिय थे और माधवराव राजीव गांधी के प्रिय होने की वजह से नाथ के लिए चुनौती थे.

पिछले दिनों एक निजी समारोह में दर्शक दीर्घा में बैठे दिग्विजय सिंह को हाथ पकडकर मंच तक ले जाने की जो शालीनता केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिखाई वो उतनी ही नकली थी जितना कि दिग्विजय सिंह का महाराज पिता-पुत्र के आगे कोर्निश करना. इसी घटना के बाद दिग्विजय सिंह ने अपने ऊपर लगे खलनायकी के दाग धोने का अभियान शुरू कर दिया. पहले कहा कि ज्योतिरादित्य भले ही भाजपा में हैं लेकिन मेरे पुत्रवत हैं. उनके पिता माधवराव सिंधिया और मैने साथ-साथ काम किया है. दिग्विजय सिंह ने इस घटना के बाद पाडकास्ट और दूसरे संचार माध्यमों के जरिए खुद को सिंधिया की बगावत के लिए जिम्मेदार होने से बचाने के लिए कमलनाथ को भी मोहरा बनाया और ये साबित करने की कोशिश की कि सिंधिया को कांग्रेस छोडने के लिए मजबूर करने के लिए जिम्मेदार वे नही बल्कि कमलनाथ हैं. 

दिग्विजय का कौन सा झूठ सच है और कौन सा सच झूठ है ये पकडना भगवान के बूते की भी बात नहीं है, क्योंकि दिग्गी राजा झूठ को सच और सच को झूठ बनाने में महारत   हासिल राजनीतिज्ञ हैं.

इस पूरे प्रसंग में कमलनाथ ने बहुत संजीदगी का परिचय दिया. उन्होंने दिग्विजय सिंह की बातों का न खंडन किया न समर्थन. उन्होने एक तरह से इस मामले से पल्ला झाड लिया क्योंकि उन्हे पता है कि दिग्विजय सिंह पर आंख बंदकर भरोसा करने से उन्हे कितना नफा, नुक्सान हुआ? छिंदवाड़ा की अजेय लोकसभा सीट भी कमलनाथ को दिग्विजय सिंह का साथ निभाने की वजह से गंवाना पडी, अन्यथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो उन्हे कोई शिकायत थी ही नहीं.प्रधानमंत्री मोदी से उनका सीधा संपर्क था. 2019 में छिंदवाड़ा लोकसभा से जीते अपने बेटे नकुलननाथ को आशीर्वाद दिलाने कमलनाथ खुद प्रधानमंत्री मोदी के आवास पर गए थे.

लब्बोलुआब ये है कि  नये जमाने की कांग्रेस में न दिग्विजय सिंह का कोई भविष्य है और न कमलनाथ का.ज्योतिरादित्य कांग्रेस छोड ही चुके हैं. फिलहाल उनकी घर वापसी की न कोई जरुरत है और न सूरत फिर भी वे घर वापसी के लिए एक न एक खिडकी खुली रखना चाहते हैं.

बदले मंजर में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कौन नायक है, कौन खलनायक है तथा कौन अधिनायक है ये तय करना टेढी खीर है. भविष्य में कमलनाथ परिवार भले ही कांग्रेस की राजनीति से दूर चला जाए किंतु राघौगढ का खीची राजघराना और ग्वालियर का सिंधिया राजघराना अपनी राजनीतिक अदावत को जारी रखने के लिए कमर कसकर तैयार है. दिग्विजय सिंह का बेटा राजनीति में एक मंत्री बनकर पैर जमा चुका है और ज्योतिरादित्य का बेटा महाआर्यमन क्रिकेट के रास्ते राजनीति में प्रवेश कर चुका है.खानदानी अदावत की नयी कहानियाँ अभी समाप्त होने वाली नहीं हैं.

=अपनी राय से अवगत अवश्य कराएं.)

@ राकेश अचल

सोमवार, 25 अगस्त 2025

देश में जेपीसी की विश्वसनीयता भी अब संदिग्ध

 

मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और प्रधानमंत्री को 30 दिन की गिरफ्तारी की स्थिति में पद से बर्खास्त करने वाले विधेयकों और संवैधानिक संशोधन पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को विपक्षी दलों ने बड़ा झटका दिया। तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस जेपीसी का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया। टीएमसी का बहिष्कार पहले से तय माना जा रहा था, लेकिन सपा के कदम ने विपक्षी खेमे में हलचल मचा दी है।जेपीसी के बहिष्कार के बाद इन समितियों की विश्वसनीयता पर  प्रश्नचिन्ह लग गया है.

टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने जेपीसी को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “मोदी गठबंधन एक असंवैधानिक बिल की जांच के लिए जेपीसी बना रहा है। यह सब एक नाटक है और हमें इसे नाटक ही कहना था। मुझे खुशी है कि हमने यह कदम उठाया है।”

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी टीएमसी का साथ देते हुए कहा, “विधेयक का विचार ही गलत है। जिसने यह बिल पेश किया (गृह मंत्री अमित शाह) उन्होंने खुद कई बार कहा है कि उन पर झूठे केस लगाए गए थे। अगर कोई भी किसी पर फर्जी केस डाल सकता है तो फिर इस बिल का मतलब क्या है?”अब कांग्रेस पर भी विपक्षी एकजुटता के नाम पर दबाव बढ़ रहा है। कांग्रेस अब तक जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में झुकी हुई थी, लेकिन सपा के रुख से पार्टी के भीतर संशय गहरा गया है.

सपा प्रमुख ने विधेयकों को भारत के संघीय ढांचे से टकराने वाला करार दिया। उन्होंने कहा, “जैसे यूपी में हुआ मुख्यमंत्री अपने राज्यों में दर्ज आपराधिक मामले वापस ले सकते हैं। केंद्र का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होगा क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। केंद्र सिर्फ उन्हीं मामलों में दखल दे पाएगा जो केंद्रीय एजेंसियों जैसे सीबीआई, ईडी आदि द्वारा दर्ज हों।”

डेरेक ओ’ब्रायन ने जेपीसी की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले इसे जनहित और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक सशक्त तंत्र के रूप में देखा जाता था। उन्होंने कहा, “2014 के बाद से जेपीसी की भूमिका काफी हद तक खोखली हो गई है। सरकारें इसका राजनीतिक इस्तेमाल करने लगी हैं, विपक्ष के संशोधन खारिज किए जाते हैं और बहस महज औपचारिकता बनकर रह गई है।”

विपक्षी दल टीएमसी के बहिष्कार को लेकर पहले से तैयार थे, लेकिन सपा के कदम ने असमंजस पैदा कर दिया है। कई दलों का मानना है कि संसदीय समितियों में हुई बहस अदालत की सुनवाई और जनमत निर्माण में अहम साबित होती है। लेकिन सपा के बहिष्कार ने विपक्ष की सामूहिक आवाज को कमजोर किया है.

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक भारत में 2014 से 25 अगस्त 2025 तक  संसद द्वारा गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी)को कुल 10 विधेयक भेजे गए हैं। जेपीसी एक अस्थायी समिति होती है, जो विवादास्पद या जटिल विधेयकों की विस्तृत जांच के लिए दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से सदस्यों के साथ गठित की जाती है। 16वीं लोकसभा (2014-2019) में कुल 133 विधेयक पारित हुए, जिनमें से 25 प्रतिशत को विभिन्न समितियों (जेपीसी सहित) को भेजा गया था। 17वीं लोकसभा (2019-2024) में 16 प्रतिशशत विधेयक समितियों को भेजे गए, जिसमें जेपीसी को 4 विधेयक मिले। 18वीं लोकसभा में अब तक 3 विधेयक जेपीसी को भेजे गए हैं।

विधेयकों की सूची (वर्षानुसार)

भाजपा सरकार बनने के बाद 2014 से 2025 तक जेपीसी को भेजे गए प्रमुख विधेयकों में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक 2015,नागरिटता संशोधन विधेयक 2016,वित्तीय सुरक्षा हितों को लागू करने और कर्ज वसूली से जुड़ा विधेयक 2016,दिवालिया और दिवालियापन संहिता। जेपीसी ने इसे मजबूत बनाने की सिफारिश की।वित्तीय संकल्प और जमा बीमा विधेयक 2017

व्यक्तिगत डेटा संरक्षणविधेयक 2019। गोपनीयता संबंधी चिंताओं के कारण जेपीसी को भेजा गयाजैव विविधता संशोधन। विधेयक 2021 पर्यावरण विशेषज्ञों की राय लेने के लिए जेपीसी को भेजे गये.

इसके अलावा जन विश्वास संशोधन विधेयक 2022। दंड प्रावधानों को सरल बनाने के लिए बहु-राज्य सहकारी समितियां संशोधन विधेयक  2023। सहकारी क्षेत्र सुधार के लिए।वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023। वन क्षेत्रों के उपयोग पर विवाद के कारणजेपीसी को भेजे गए.

 मौजूदा 18वीं लोकसभा के प्रारंभिक सत्रों में (जून 2024 से अगस्त 2025 तक) तीन और विधेयक जेपीसी को भेजे गए हैं, इनमे- वक्फ संपत्ति सुधार विधेयक 2024 प्रमुख है. इस जेपीसी में जमकर हाथापाई हुई.जेपीसी ने जनवरी 2025 में रिपोर्ट सौंपीऔर सरकार ने कानून भी बना दिया जो अभी सुप्रीम कोर्ट में फैसले का इंतजार कर रहा है. मोदी सरकार ने इसके बावजूद 129 और 130 वां संविधान संशोधन विधेयक, केंद्रीय परिक्षेत्र संशोधन विधेयक 2024भी जेपीसी की झोली में डाल दिया. 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक 2024  जेपीसी  के पास है ही.

 सरकार ने जो ताजा विधेयक जेपीसी को भेजा है वो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को आपराधिक मामलों में जेल जाने पर हटाने से जुड़ा है.

कुल विधेयक 2014 से अब तक लगभग 300 पारित हुए, लेकिन जेपीसी केवल विवादास्पद मामलों में।विशेषज्ञों कहना है कि मोदी सरकार में यूपीए या उससे पहले की सरकारों के मुकाबले जेपीसी का उपयोग कम हुआ क्योंकि अधिकांश विधेयक सीधे पारित या स्टैंडिंग कमेटी को भेजे गए। उदाहरण के लिए सरोगेसी बिल को सेलेक्ट कमेटी भेजा गया, न कि जेपीसी।

 जेपीसी को भेजे गए विधेयक आमतौर पर समिति की रिपोर्ट के बाद संशोधनों के साथ संसद में विचार-विमर्श के लिए लाए जाते हैं। अधिकांश मामलों में, विधेयक पास हो जाते हैं, लेकिन कुछ लैप्स हो जाते हैं या वापस ले लिए जाते हैं। 

जैपसे हिंदू विवाह और विच्छेद विधेयक, 1952 दो साल बाद 1954 में जेपीसी को भेजा गया जो बाद में समिति ने रिपोर्ट आने पर कुछ संशोधनों के साथ 1955 में पास हुआ।विशेष विवाह विधेयक 1952  भी 1954 में जेपीसी को भेजा गया और रिपोर्ट के बाद 1954 में पास हुआ।

सवाल ये है कि सरकार जेपीसी को ढाल बनाने के बजाय विधेयकों पर संसद में खुलकर बहस क्यों नहीं करातीं? सरकार ध्वनिमत से या हंगामें के बीच कोई विधेयक क्यों पारित कराना चाहती हे. विगत 21अगस्त 2025को समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र में यही हुआ. 130 वें संविधान संशोधन विधेयक को छोड शेष आधा दर्जन विधेयक हंगामें में बिना बहस के पास करा लिए गये और वे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून भी बन गये.

@ राकेश अचल

रविवार, 24 अगस्त 2025

अमेरिका में रह रहे भारतीयों पर गाज, भारत से डाक सेवा बंद

 

अगर आपके परिवार का कोई सदस्य अमेरिका में रहता है तो ये खबर आपके लिए ही है. क्योंकि भारतीय डाक विभाग 25 अगस्त, 2025 से अमेरिका के लिए ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय डाक सेवाएं अस्थायी रूप से बंद कर देगा।अमेरिकी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के नियमों में कुछ बड़े बदलाव किए हैं जिसकी वजह से भारतीय डाक विभाग को ये अप्रिय कदम उठाने पर मजबूर होना पडा है.

आपको बता दूं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 30 जुलाई, 2025 को विशेष आदेश जारी किया था। इस आदेश के अनुसार 800 डॉलर तक के सामान पर लगने वाली ड्यूटी (सीमा शुल्क) की छूट खत्म कर दी गई है। पहले, कम कीमत वाले सामान बिना ड्यूटी के अमेरिका में आ जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। आदेश के मुताबिक 29 अगस्त, 2025 से अमेरिका जाने वाले सभी सामानों पर ड्यूटी लगेगी, चाहे उनकी कीमत कुछ भी हो। यह नियम इंटरनेशनल इमर्जेंसी इकोनॉमी पावर एक्ट  के तहत लागू होगा। हालांकि, 100 अमेरिकी डॉलर तक के गिफ्ट आइटम पर यह नियम लागू नहीं होगा।

अमेरिकी सरकार के नए नियम के अनुसार, अब ट्रांसपोर्ट कंपनियों और यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन द्वारा मान्यता प्राप्त पार्टियों को अंतरराष्ट्रीय डाक शिपमेंट पर ड्यूटी जमा करनी होगी। 

सीबीपी ने 15 अगस्त, 2025 को कुछ शुरुआती नियम जारी किए थे, लेकिन मान्यता प्राप्त पार्टियों को चुनने और ड्यूटी जमा करने के तरीकों के बारे में पूरी जानकारी अभी तक नहीं दी गई है। इन वजहों से, अमेरिका जाने वाली अंतरराष्ट्रीय मेल को संभालने वाली एयरलाइंस ने 25 अगस्त के बाद डाक कंसाइनमेंट स्वीकार करने में असमर्थता जताई है। उनका कहना है कि वे नए नियमों का पालन करने के लिए तकनीकी और परिचालन रूप से तैयार नहीं हैं।

इसलिए, डाक विभाग 25 अगस्त से अमेरिका जाने वाले सभी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय डाक की बुकिंग बंद कर देगा। लेकिन, पत्र/दस्तावेज और 100 अमेरिकी डॉलर तक के गिफ्ट आइटम अभी भेजे जा सकते हैं.

 डाक विभाग ने कहा है कि वह सीबीपी और यूनाइटेड पोस्टल सर्विसेस से और जानकारी मिलने के बाद इन चीजों को अमेरिका भेजेगा। डाक विभाग सभी संबंधित लोगों के साथ मिलकर काम कर रहा है और स्थिति पर नजर रख रहा है। विभाग जल्द से जल्द अमेरिका के लिए पूरी डाक सेवा फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहा है।

पीआईबी की  विज्ञप्ति के अनुसार, जिन ग्राहकों ने पहले से ही ऐसे आइटम बुक किए हैं जो अब नए नियमों के अनुसार नहीं भेजे जा सकते, वे डाक शुल्क का रिफंड ले सकते हैं। विभाग ने असुविधा के लिए खेद जताया है और जल्द से जल्द पूरी सेवा बहाल करने की बात कही है.

उल्लेखनीय है कि अमेरिका में कम से कम 30 लाख भारतीय अलग अलग शहरों में रहते हैं. कुछ छात्र हैं तो कुछ नौकर पेशा हैं. अमेरिका में जन्मै भारतीयों को जोड लिया जाए तो ये संख्या 50 लाख से अधिक हो सकती है. इन भारतीयों के लिए भारत से रोजाना लगभग 11हजार डाक अमेरिका के लिए भेजी जाती हैं. डाक विभाग के फैसले से जहाँ अमेरिका में रहनेवाले लाखों भारतीय परेशान होंगे वहीँ विभाग को भी बडा आर्थिक नुक्सान होगा. कुछ निजी कूरियर कंपनियों से भी डाक भेजी जाती हैं लेकिन ये सेवाएं  बहुत मंहगी हैं.

अमेरिका के टैरिफ वार का शिकार भारत के आम नागरिकों पर पडने वाली ये पहली बडी मार है. इस बारे में भारत और अमेरिका के बीच कोई बातचीत हुई या नहीं इसका कोई विवरण अभी नहीं मिला है.

@ राकेश अचल

शनिवार, 23 अगस्त 2025

ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने जनसुनवाई में किया जनसमस्याओं का निराकरण

 रविकांत दुबे जिला प्रमुख 'आपके द्वार न्यूज



ग्वालियर 23 अगस्त । ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने शनिवार को अपने ग्वालियर रेसकोर्स रोड स्थित सरकारी कार्यालय में जनसुनवाई के दौरान समस्याओं का निराकरण किया। इस अवसर पर उन्होंने सम्बन्धित अधिकारियों को समस्याओं के त्वरित निराकरण के निर्देश देते हुए समस्याओं का निदान निर्धारित समय सीमा में करने की बात कही। ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने जनसुनवाई में आई जरुरतमंद महिलाओं को तत्काल राशन दिलाने के निर्देश के साथ ही वृद्धजनों की वृद्धावस्था पेंशन तथा मुफ्त इलाज हेतु आयुष्मान कार्ड बनवाने के निर्देश भी दिए और ऊर्जा मंत्री ने निशक्तजन को ट्राई साइकल वितरण की।

ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने इस अवसर पर मुलाकात करने आए लोगों को आश्वस्त किया कि यह सेवक किसी भी परिवार के साथ अन्याय नहीं होने देगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी ने अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचे इसके पुख्ता इंतजाम किए हैं। इस दिशा में सरकार भी सतत प्रयत्नशील है।

इस अवसर पर ऊर्जा मंत्री श्री तोमर ने क्रमवार एक-एक आवेदक के पास जाकर उनकी समस्याएँ सुनीं और सम्बन्धित अधिकारियों को त्वरित कार्यवाही के निर्देश दिए। इसके अलावा उन्होंने मोबाइल फोन से संबंधित अधिकारियों से चर्चा करते हुए समस्याओं के निराकरण में किसी भी सूरत में लापरवाही बर्दाश्त नहीं करने की हिदायत दी। ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर द्वारा आमजन की बिजली, पानी व राशन से संबंधित शिकायतों के निराकरण के लिए  जनसुनवाई की जाती है।

भाजपा की खटाई से सहयोगी दलों में घबडाहट

  

 बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही भाजपा की बैशाखी बने जनता दल यू और दूसरे जेबी संगठनों के दो फांक होने की सुगबुगाहट तेज हो गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गया दौरा कई सियासी संकेत छोड़ गया है. गया में आयोजित  सभा में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन से पहले मंच पर मौजूद जेडीयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह और आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की ओर मुस्कुराते हुए कुछ इशारा किया. मंच पर हुई यह हलचल कैमरों में कैद हो गई और अब इसे लेकर राजनीति के गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं.

आपको याद होगा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की स्थापना 1998 तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के समय में हुई थी, जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में 13-24 दलों का गठबंधन बना था। तब से लेकर 27 साल में एनडीए से कई दल अलग हो चुके हैं. गठबंधन में नये दलों के जुडने और पुराने दलों के अलग होने का सिलसिला अनंत है. कभी कोई दल  नागरिकता संशोधन बिल (सीएए), अनुच्छेद 370 हटाने, या किसान कानून पर मतभेद के कारण जुडा तो कोई अलग हो गया. अनेक दल  चुनावों में सीटों का बंटवारा  विवाद की वजह से गठबंधन के बाहर गए तो कुछ

क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर भाजपा से छिटक गये. मणिपुर हिंसा या बिहार/महाराष्ट्र की राजनीति इसका उदाहरण है.भाजपा की बढ़ती ताकत से भी छोटे दलों को लगता है कि बीजेपी उनका महत्व कम कर रही है।

आज की केंद्र सरकार की बैशाखी बना जनता दल (यूनाइटेड)  2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाने के विरोध में अलग हुआ था और यूपीए से जुड गया था. भाजपा की दूसरी बैशाखी तेलुगु देशम पार्टी 2018 में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जा न मिलने पर एनडीए से अलग हुई लेकिन 2024 में फिर जुड़ गई. इसी तरह शिरोमणि अकाली दल 2020 कृषि कानूनों के विरोध में भाजपा से अलग हो गया.

बिहार से पहले महाराष्ट्र में भाजपा की पुरानी सहयोगी शिवसेना भाजपा की वजह से ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद, विभाजित हुई; उद्धव ठाकरे गुट अलग हो गया। एकनाथ शिंदे का गुट आजकल भाजपा के साथ है.स्वाभिमानी पक्षा  भी 2019 में  किसान कानूनों के विरोध में।भाजपा से अलग हो गया था.2021 में अगपा असम में स्थानीय मुद्दों पर  भाजपा से अलग हुई बाद में फिर जुड़ गई.

जम्मू कश्मीर में भाजपा के साथ रही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी 2019 में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद भाजपा से अलग हो गई.गोरखा जनमुक्ति मोर्चा दार्जिलिंग में क्षेत्रीय मांगें पूरी न होने पर 2020 में भाजपा का गठबंधन छोड गया.राष्ट्रीय लोक समता पार्टी -रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में, सीट शेयरिंग विवाद पर टूटी फिर जुडी.

भाजपा ने प्रायः अपने सहयोगी दलों को या तो तोड दिया या उन्हे तवज्जो नहीं दी.हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) 2019 बिहार में सीट न मिलने पर भाजपा से दूर हुआ.नागालेंड का नागा पीपुल्स फ्रंट,कर्नाटक जनता पार्टी - और बाद में भाजपा के बागी बी.एस. येदियुरप्पा की पार्टी, अलग हुई बाद में भाजपा में विलय हो गई।लोक जनशक्ति पार्टी को 2021  में भाजपा ने तोडा, हरियाणा में इंडियन नेशनल लोक दल  गठबंधन  से अलग हुआ.त्रिणमूल कांग्रेस 2009 के बाद स्थायी रूप से मूल एनडीए की सदस्य थी, लेकिन 2009 में अलग हो गई और आज भाजपा की दुश्मन नंबर एक है.

ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी 2022,  में अलग हुई और फिर सौदा पटने पर फिर 2025 में फिर  शामिल हो गई. यूपी में ही अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल  से भाजपा के रिश्ते बनते बिगडते रहे.संजय निषाद की निषाद पार्टी,मिजो नेशनल फ्रंट,कुकी पीपुल्स अलायंस,पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट,गोवा फॉरवर्ड पार्टी,जन्नायक जनता पार्टी पुत्तिया तमिलागम, एडीएमके जैसे तमाम क्षेत्रीय दल भाजपा की अहमन्यता केकेगंभीर शिकार बने.

लौटकर बिहार  आते हैं. बिहार के गयाजी में प्रधानमंत्री मोदी के दौरान जब मंच पर मौजूद एनडीए के सभी नेताओं का हाथ जोड़कर अभिवादन कर रहे थे, उसी दौरान वह मुस्कुराते हुए आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पास रुके और कुछ बातचीत की. वहीं इसके बाद वह आगे बढ़ते गए, फिर जैसे ही केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के पास पहुंचे उनको भी कुछ कहा, जिसके बाद ललन सिंह ने सिर हिलाते हुए हां कहा. इस दौरान ये दोनों तस्वीरें कैमरें में कैद हो गईं. बिहार चुनाव को देखते हुए ये तस्वीरें काफी कुछ इशारा करती है. सामान्य तौर पर इसे मंचीय औपचारिकता कहा जा सकता है, लेकिन चुनावी साल में इस इशारे को हल्के में नहीं लिया जा सकता. खासकर तब जब ललन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा की बिहार चुनाव में अहम भूमिका मानी जा रही है.

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए खेमे में सीट बंटवारे और सहयोगी दलों की भूमिका को लेकर गहमागहमी जारी है. ऐसे में मोदी का यह इशारा  गठबंधन की मजबूती और एकजुटता का संकेत हो सकता है. इससे जहां जेडीयू में टूट की अटकलें बढी हैं वहीँ  ये भी माना जा रहा है कि भाजपा  उपेंद्र कुशवाहा को भी सम्मानजनक जगह देने का मूड बना चुकी है. 

आपको पता है कि एनडीए की अहम सहयोगी जेडीयू के अंदर नीतिश कुमार के नेतृत्व को लेकर असंतोष है. मोदी ऐसे में लल्लन पर हाथ रखकर शिश सेना की तरह जेडीयू को भी दो फांक करना चाहते हैं. एस आई आर के मुद्दे पर बुरी तरह से घिरी भाजपा बाजी जीतने के लिए किसे छोड दे और किसे साथ ले ले अनुमान लगाना कठिन है.

@ राकेश अचल

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

आज से मोदी युग नये दौर में प्रवेश करेगा

 

संसद के मानसून सत्र की समाप्ति के साथ ही आज से देश में 2014 से शुरू हुआ मोदी युग एक नये दौर में प्रवेश करने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस नये दौर में घर के भीतर और घर के बाहर इतनी चुनौतियां सीना ताने खडी दिखाई देंगी जिनकी कल्पना कम से कम मोदी जी ने तो नहीं की होगी. जिस देश की जनता ने तमाम प्रतिबद्धताओं को धता दिखाकर मोदी जी को अपनी पलकों पर बैठाया था, आज वही जनता सडकों पर और जनता के प्रतिनिधि संसद में '  वोट चोर-गद्दी छोड'के नारे लगा रहे हैं और मोदी जी स्थितिप्रज्ञ होकर इन नारों को सुन रहे हैं.

मोदी जी का स्वागत करने वालों की भीड में शायद मै भी रहा होऊं, लेकिन आज मेरी पूरी सहानुभूति मोदीजी के प्रति है, क्योंकि जो जनता कल तक मोदीजी पर लट्टू थी आज उसके तेवर बदले हुए हैं. जनता अब 56' के सीने वाले मोदीजी के सामने अपने तीर-कमान हो चुके सीने तानकर उनपर वोट चोरी का आरोप लगा रही है. वोट चोर, गद्दी छोड का नारा यद्यपि कांग्रेस का नारा था लेकिन अब ये लोक व्यापी हो गया है.

मुझे पूरा यकीन है कि मोदीजी इस नारे से न डरेंगे और न गद्दी छोडेंगे. वे अपने हनुमान गृहमंत्री अमित शाह को साथ लेकर पूरी ताकत से विपक्ष से और देश की जनता से लडेंगे. मोदीजी के पीछे लठसंघियों की लाखों की फौज के साथ ही दुनिया की सबसे ज्यादा सदस्यों वाली भाजपा के कार्यकर्त्ता हैं जो सडकों पर उमड रहे जन सैलाब को टिड्डी दल की तरह समाप्त कर देंगे. मोदीजी संसद के मानसून सत्र के समापन से पहले 130 वां संविधान संशोधन विधेयक ले आए हैं. इस विधेयक से इस बात की भनक तो मिल रही है कि विरोधियों को उसी तरह जेलों में ढूंसने का इंतजाम कर चुके हैं जिस तरह पचास साल पहले देश पर 19महीने का आपातकाल लादकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया था 

आपको याद होगा कि मोदी जी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो नेहरू को गरियाकर जन समर्थन हासिल करते आए हैं. लेकिन उनका ये अस्त्र- शस्त्र अब मोथरा हो चला है. मोदी जी कहने पर अब जनता ताली और थाली बजाने को तैयार नहीं है. मोदी जी की सत्ता जिन दो बैशाखियों पर टिकी है उनमें से एक में अलोकप्रियता की दीमक लग चुकी है.मोदीजी से अब अकेले लोस और रास में विपक्ष के नेता ही सवाल नहीं कर रहे अपितु माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी सवाल कर रहा है कि -'यह अदालत संविधान का ही एक अंग है। यदि एक संवैधानिक संस्था बिना किसी वैध कारण के अपना काम नहीं कर रही है तो फिर क्या अदालत को यह कहना चाहिए कि हम शक्तिहीन हैं और हमारे हाथ बंधे हैं। हमें कुछ तो निर्णय करना होगा। लेकिन केंद्र सरकार में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हर समस्या का समाधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही किया जाए, ये जरूरी नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर हो रही सुनवाई के दौरान ये तर्क दिया।केंद्र ने कहा कि कुछ मुद्दों पर मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के साथ बातचीत होनी चाहिए। सरकार ने कहा कि हर मामले में न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ये सुनवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा अप्रैल में विधेयकों को पारित करने की समयसीमा तय किए जाने के बाद राष्ट्रपति ने रेफरेंस भेजकर कोर्ट से कुछ सवाल पूछे थे.

मोदीजी जिस उग्रता के साथ केंद्रीय राजनीति में आए थे आज वही उग्रता उन्हे विपक्ष की ओर से देखने को मिल रही है. पिछले 11 साल में मोदीजी ने विपक्षी एकता में सेंध लगाकर अपना अश्वमेघ यज्ञ जारी रखा, लेकिन अब बिहार में उनका अश्वमेघ का घोडा वोट चोरी के आरोप में रंगे हाथों पकडा जा चुका है. मोदीजी घोडे पर सवार हैं लेकिन घोडे की रास यानि लगाम लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हाथ में है. ठिठके हुए घोडे को राहुल गांधी के चंगुल से छुडाना बहुत आसान नहीं है.

अब आधे से ज्यादा संसद और आधे से ज्यादा भाजपा मोदीजी के साथ नहीं है. कांस्टीट्यूशनल क्लब के चुनाव में भाजपा की बंद मुठ्ठी खुल गई है. मोदी विरोधी रूढी ने राहुल गांधी से सार्वजनिक रूप से हाथ मिलाकर ये साबित कर दिया है कि वे भाजपा में मोदी द्वारा उपेक्षित लोगों का नेतृत्व रूढी करने जा रहे हैं जैसे मोदीजी ने कांग्रेस के दुर्ग में सेंध लगाने के लिए शशि थरूर को तोडा था उसी तरह कांग्रेस ने भी भाजपा के दुर्ग में रूडी को तोडकर मोदी जी के दुर्ग में सेंध लगाने में कामयाब हो गये.

नये मोदी युग में जो भी होगा वो सब अप्रत्याशित होगा. या तो विपक्ष की कमर टूटेगी या फिर मोदी जी की. फैसला जनता करेगी. जनता अब तक मोदीजी के हर कारनामें पर,, हर फैसले पर मौन थी, किंतु यही मौन अब मुखरता में तब्दील हो गया है. मोदी के साथ आज भी ऐसे समर्थकों की भीड है जो 500₹ लीटर पैट्रोल खरीदने को तैयार है लेकिन उसे मोदी चाहिए. मोदीजी की ब्रांड वेल्यू का पता बिहार में चलेगा. तब तक के लिए मोदीजी और उनके प्रतिद्वंदी राहुल गांधी को शुभकामनायें.

@राकेश अचल 

 

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

इमरजेंसी ' के बाद ' सुपर इमरजेंसी ' की ओर बढता देश

 शीर्षक पढकर न चौंकिए, न विचलित होइए लेकिन सावधान जरूर हो जाइए क्योंकि भारत इमरजेंसी के पचास साल बाद एक और इमरजेंसी की ओर बढ रहा है जिसे आने वाले दिनों में' ' सुपर इमरजेंसी ' कहा जा सकता है. हमारी मौजूदा सरकार ने संसद के मानसून सत्र के समाप्त होने की पूर्व संध्या पर लोकसभा में संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025:  पेश कर इस ' सुपर इमरजेंसी ' की आहट दे दी है.

सुपर इमरजेंसी लादने के लिए एक ब, आना तलाशा गया है कि फिलहाल भारतीय संविधान में गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए मंत्री को हटाने के लिए प्रावधान नहीं है. ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री  या केंद्रीय मंत्रिपरिषद के किसी मंत्री और राज्यों एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद के किसी मंत्री को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239ए में बदलाव की जरूरत महसूस की गई है.

आपको बता दूं कि लोकसभा में पेश किए गए 130वां संविधान संशोधन विधेयक का उद्देश्य गंभीर आपराधिक आरोपों (5 वर्ष या अधिक की सजा वाले अपराध) में गिरफ्तार होने या 30 दिनों तक हिरासत में रहने पर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, और केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान करना है।यह विधेयक अनुच्छेद 75 (केंद्र) और अनुच्छेद 164 (राज्य) में संशोधन करता है,  इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि हिरासत से रिहाई के बाद राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा पुनर्नियुक्ति संभव है।

विधेयक को संसद की संयुक्त समिति को भेजा गया है, और विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस और एआईएम आई एम ने इसे संविधान विरोधी और लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है।विधेयक पेश करते समय केंद्रीय गृहमंत्री बेहद डरे हुए थे. वे हमेशा पहली पंक्ति में बैठते थे लेकिन 20अगस्त को चौथी पंक्ति में बैठे. शाह अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त मार्शल भी साथ में लाए थे, मुमकिन है कि वे सीआईएस एफ के ही जवान हों.

इस विधेयक को पेश करते ही पक्ष विपक्ष के सांसदों में धक्का - मुक्की भी हुई. विपक्ष ने विधेयक की प्रतियाँ फाडकर गृहमंत्री के ऊपर उछाल दीं. बात आगे बढ सकती थी किंतु सभापति ने सदन की कार्रवाई 21अगस्त तक लिए स्थगित कर स्थिति को बेकाबू होने से रोका. विपक्ष के विरोध के प्रति पहले से आशंकित सरकार की मंशा के अनुरूप जेपीसी को भेज दिया. अब ये विधेयक संसद के आगामी सत्र तक जेपीसी के पास रहेगा और इस विधेयक को भी उसी तरह कानून बना दिया जाएगा जैसे कि वक्फ बोर्ड कानून बना दिया गया.ये कानून अभी सुप्रीम कोर्ट के पास सेफ(सुरक्षित) रखा हुआ है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर  कहा है कि 130वां संविधान संशोधन विधेयक ‘सुपर-इमरजेंसी’ से भी आगे का कदम है, जो भारत में लोकतांत्रिक युग को हमेशा के लिए समाप्त कर देगा। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार के इस विधेयक का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता को समाप्त करना है और इसके जरिए मौजूदा केंद्र सरकार ‘एक व्यक्ति-एक पार्टी-एक सरकार’ सिस्टम को मजबूत करने का प्रयास है.

जरूरी नहीं कि इस विधेयक को लेकर जैसा ममता बनर्जी सोचती हैं वैसा ही पूरा देश भी सोचे, लेकिन इस समय वोट चोरी को लेकर एकजुट हुआ विपक्ष जरूर ममता बनर्जी की तरह सोच सकता है.विपक्ष को एक करने के काम पहले एस आई आर आया और अब लगता है कि 130वां संविधान संशोधन विधेयक  भी विपक्ष को एक करने में सहायक होगा. सत्ता पक्ष की नीयत यदि इस विधेयक को लेकर साफ होती तो इसे संसद के शुरु में ही लाया जाता, किंंतु ऐसा नहीं हुआ. संसद में इस विधेयक को जानबूझकर  सत्र समापन की पूर्व संध्या पर लाया गया ताकि इस विधेयक पर बहस हो ही न पायें. ये विधेयक इसलिए भी आपत्तिजनक है क्योंकि ये देशकाल परिस्थिति के अनुरूप बिल्कुल नहीं है. इस देश में शांति भंग करने आरोपी को जमानत हासिल करने मैं महीनों लग जाते हैं ऐसे में केवल आरोप लगने और गिरफ्तारी होने के बाद 30 दिन की हिरासत सदस्यता छीनने का बाजिब आधार नहीं है.

मुझे लगता है कि भाजपा आने वाले दिनों मे इस विधेयक को लेकर बिहार विधानसभा चुनाव में भी उतरेगी. क्योंकि मतदाता सूची में काट-छांट के मुद्दे पर सरकार बचाव की मुद्रा में है. इसे आप शतुरमुर्गी मुद्रा भी कह सकते हैं. आने वाले दिनों में ये विधेयक लगातार जैरे बहस रहेगा.


वैसे एडीआर रिपोर्ट कहती है,कि वर्तमान लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 यानी 46 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. इसमें 25 से अधिक को दोषी भी ठहराया जा चुका है. कुल 233 सांसदों (43 प्रतिशत) ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए थे. वहीं, यह आंकड़ा 2019 में 233 (43%) , 2014 में यह आंकड़ा 185 (34 %), 2009 में 162 (30%) और 2004 में 125 (28 प्रतिशत था. रिपोर्ट  के अनुसार, 18वीं लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भाजपा के 240 विजयी उम्मीदवारों में से 94 (39 प्रतिशत) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. कांग्रेस के 99 सांसदों में से 49 (49 प्रतिशत) ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं और समाजवादी पार्टी के 37 सांसदों में से 21 (56 प्रतिशत) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं.

TMC के 29 में से 13 (44 प्रतिशत), डीएमके के 22 में से 13 (59 प्रतिशत), टीडीपी के 16 में से आठ (50 प्रतिशत) और शिवसेना के सात विजयी उम्मीदवारों में से पांच (71 प्रतिशत) ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं.


विश्लेषण में पाया गया कि 63 (26 प्रतिशत) भाजपा उम्मीदवारों, 32 (32 प्रतिशत) कांग्रेस उम्मीदवारों और 17 (46 प्रतिशत) सपा उम्मीदवारों ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं.रिपोर्ट कहती है, सात (24 प्रतिशत) टीएमसी उम्मीदवार, छह (27 प्रतिशत) डीएमके उम्मीदवार, पांच (31 प्रतिशत) टीडीपी उम्मीदवार और चार (57 प्रतिशत) शिवसेना उम्मीदवार गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं.इस विधेयक के गुण-दोष ही बहस का मुद्दा हो सकते थे किंतु सरकार बहस से पहले ही भाग खडी हुई. 

मुझे याद है कि देश में जब भी ऐसे तानाशाही को मजबूत विधेयक किसी राज्य या केंद्र की सरकार ने लाने की कोशिश की है, मुंह की खाई है. बिहार का एक प्रेस विधेयक आषको याद होगा. बहरहाल देश एक अघोषित इमरजेंसी झेल ही रहा था उसे अब सुपर इमरजेंसी में बदलने की कोशिश की जा रही है.

@ राकेश अचल

बुधवार, 20 अगस्त 2025

सत्ता की बिल्ली के गले में घंटी बांधने में कामयाब कांग्रेस

वोट चोरी के मुद्दे पर देश का बिखरा विपक्ष पहली बार इतनी मजबूत से प्रकट हुआ है कि सत्ता के होश फाख्ता हो गए हैं. पिछले 11 साल में विपक्ष वोट चुराने वाली बिल्ली के गले में घंटी बांधने में कामयाब हुआ है.

सत्ता में बने रहने के लिए अब एनडीए गठबंधन जो भी योजना बनाता है, उसकी भनक विपक्ष को लग जाती है. ऐसे में विपक्ष सामूहिक रूप से प्रतिकार करने की तैयारी कर लेता है. वोट चोरी की आरोपी केंद्रीय चुनाव आयोग और सत्तारूढ भाजपा के खिलाफ संसद से सडक तक विपक्षी एकता को देश और दुनिया देख चुकी है.

राहुल गांधी की अगुवाई में बिहार में चल रही वोट अधिकार यात्रा के खिलाफ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर मोदी को खुद मोर्चा सम्हालना पड रहा है.. किसी भी देश में पार्टी का मुखिया तभी मोर्चा सम्हालता है जब उसके सारै मोहरे पिट जाते हैं. राहुल गांधी की आंधी तूफान में तब्दील होती दिखाई दे रही है. 1974-75 में ऐसी ही आंधी तत्कालीन प्रधानमत्री श्रीमती ईंदिरा गांधी की कथित तानाशाही के खिलाफ उठी थी. इस आंधी में श्रीमती गाधी की सत्ता का तंबू उखड गया था.

आपातकाल को गुजरे 50,साल ही हुए हैं लेकिन आज फिर भारत का लोकतंत्र उसी चौराहे पर खडा कर दिया गया  था. तब जनता की अगुवाई जेपी यानि जयप्रकाश नारयण ने की थी और अब  बिहार से शुरू हुए वोट बचाओ अभियान का नेतृत्व युवा राहुल गांधी कर रहे हैं. कुछ मुद्दों पर कांग्रेस से असहमत आम आदमी पार्टी और तृण मूल कांग्रेस भी अब यूपीए के साथ है.

विपक्ष की एकता की वजह से लोकसभा का मानसून सत्र पूरे समय बाधित रहा. पूरा एनडीए गठबंधन विपक्ष को प्रतिबंधित नहीं कर पाया. राहुल के साथ दोनों सदनों के 300 सांसद सडक पर निकल आए. ये विपक्षी एकता उपराष्ट्रपति पद के चुनाव से पहले की एकता के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहा है. विपक्ष ने उपराष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए सर्वानुमति को नकार कर सरकारी प्रत्याशी सीपी राधाकृष्णन के खिलाफ विपक्षी कांग्रेस ने भी अपना एक साझा प्रत्याशी मैदान में उतार दिया.विपक्ष का प्रत्याशी भी दक्षिण से है और पूर्व न्यायाधीश  है. निष्कलंक है.

संख्या गणित यदि साफ न होता तो कुछ भी हो सकता था, लेकिन अब सरकार बैक फुट पर है. विपक्ष अब बगलें झांक रहा है. हाल में ही हुए कांस्टीट्यूशनल क्लब के चुनाव में भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशी हार गया था.सवाल ये है कि क्या विपक्ष आत्मा की आवाज और दक्षिणायन होती राजनीति को एक  बार फिर इंद्रधनुषी बना सकता है? दुर्भाग्य से भारत में ज्यादातर राजनीतिज्ञों की आत्माएं सो गई हैं. वे झकझोरने पर भी नहीं जागतीं.

एक बात तय है कि यदि भाजपा बिहार विधानसभा चुनाव और उपराष्ट्रपति का चुनाव हारती है तो मध्यावधि चुनाव भी हो सकते है, क्योंकि यदि भाजपा ने दो में से एक भी बैसाखी हटती है तो भाजपा लोकसभा भंग करने से नहीं हिचकेगी. भाजपा किसी भी सूरत मे अपनी बैसाखियां कांग्रेस को देना पसंद नहीं करेगीः भाजपा फिलहाल कोई नया जोखिम लेने से बचेगी.

भारत की राजनीति के लिए ये साल निर्णायक हो सकता है. सितंबर में उपराष्ट्रपति का ही नहीं बल्कि आर एस एस के सर संघ चालक और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी चुनाव है. अक्तूबर या नवंबर में बिहार विधानसभा का चुनाव होगा. इसी समय भारत अमेरिका डील भी होना है. ये भी तय होना है कि भारत चीन रूस के साथ जाएगा या अमेरिका के साथ या फिर नेहरू की गुट निरपेक्षता आंदोलन के साथ.

@ राकेश अचल

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

सदभावना दिवस पर विशेष : राजीव गांधी की जरा याद करो कुर्बानी

भारत में सबसे कम 40 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी यदि जीवित होते तो आज वे 81 साल के हो जाते, लेकिन राजीव गांधी नान वायलोजीकल नहीं थे इसलिए उनकी हत्या कर दी गई.  20 अगस्त 1944  को मुंबई में जन्मे राजीव गांधी बाद में देश की प्रधानमंत्री बनी श्रीमती इंदिरा गांधी के पुत्र थे.21 मई 1991 को तमिलनाडु में उनकीतमिल आतंकियों ने नृशंस हत्या कर दी थी.

मै मानता हूँ कि आज के दौर में किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री का, खासतौर पर गांधी परिवार के सदस्य का नाम लेना राष्ट्रद्रोह है लेकिन मै राजीव गांधी का जिक्र कर रहा हूँ क्योंकि में किसी राजनीतिक दल का नही बल्कि आम आदमी का माउथपीस हूं.

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए पैदा हुए ही नहीं थे, वे तो एक भारतीय पायलट थे, जिन्हें1984  में उनकी मां और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भावुकता में प्रधानमंत्री बनाया गया था.राजीव गांधी ने 1989 तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने 1989 के चुनाव में अपनी हार तक पदभार संभाला और फिर लोकसभा में विपक्ष के नेता बने, और अपनी हत्या से छह महीने पहले दिसंबर 1990 में इस्तीफा दे दिया था ।

राजीव गांधी का विवाह  1968 में इटली की सोनिया से हुआ. राजीव गांधी के एक पुत्र राहुल गांधी और पुत्री प्रियंका  हैं जो बाड्रा परिवार में व्याही हैं. राहुल गांधी ने देशसेवा के लिए अब तक अपना घर नहीं बसाया.आपको पता ही होगा कि राजीव गांधी के पिता फिरोज गांधी भी कांग्रेस के सांसद रहे. राजीव के नाना देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे. राजीव गांधी की शैक्षणिक योग्यता पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया गया. क्योंकि वे लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज और इंपीरियल कॉलेज लंदन  मेंपढने गए थे.भारत सरकार ने बाद में राजीव गांधी को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था.

सब जानते हैं कि राजीव गांधी  का महात्मा गांधी से कोई  सीधा संबंध नहीं था । वे राजनीतिक रूप से शक्तिशाली नेहरू-गांधी परिवार से थे , जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से जुड़ा था। उनके बचपन के अधिकांश समय में, उनके नाना जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। गांधीजी ने दून स्कूल , एक कुलीन बोर्डिंग संस्थान, और फिर यूनाइटेड किंगडम में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की । वे 1966 में भारत लौट आए और राज्य के स्वामित्व वाली इंडियन एयरलाइंस के लिए एक पेशेवर पायलट बन गए । वे चाहते तो सांसद भी बन सकते थे लेकिन वे राजनीति के लिए बने ही नहीं थे.1970 के दशक के अधिकांश समय में, उनकी माँ प्रधानमंत्री थीं और उनके छोटे भाई संजय एक सांसद थे वे जब तक बस चला अराजनीतिक ही रहे। वो तो 1980 में एक विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु के बाद, गांधी अपनी माँ के कहने पर अनिच्छा से राजनीति में आए। अगले वर्ष उन्होंने अपने भाई की अमेठी संसदीय सीट जीती और भारतीय संसद के निचले सदन, लोकसभा के सदस्य बने । 

राजीव गांधी को उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी ने बाकायदा राजनीति का प्रशिक्षण दिया.प्रशिक्षु  राजीव गांधी को कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाया गया और 1982 के एशियाई खेलों के आयोजन में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई ।

31 अक्टूबर 1984 की सुबह, उनकी मां  और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या   बाद राजीव  गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद ही उन्हे अपने नेतृत्व की परीक्षा भी देना पडी क्योंकि पूरे देश में आक्रोषित संगठित भीड़ ने सिख समुदाय के खिलाफ दंगे शुरू कर दिए., दंगों के बावजूद दिसंबर में जब आम चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी ने आजादी के बाद का सबसे प्रचंड बहुमत हासिल किया. लोकसभा में कांग्रेस को 541 में से 414 सीटें मिलीं.।  आज के प्रधानमंत्री के लिए इतना प्रचंड बहुमत हासिल करना एक सपना बनकर रह गया. वे 400 पार का लक्ष्य लेकर पिछला आम चुनाव लडे किंतु 240 सीटों पर ही सिमिट गए.

राजीव गांधी का कार्यकाल भोपाल आपदा , बोफोर्स घोटाला और मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम जैसे विवादों में घिरा रहा. । 1988 में वे उग्रवादी तमिल समूहों को नाराज़गी के शिकार बन गये. क्योंकि राजीव गांधी ने , 1987 में हस्तक्षेप किया, श्रीलंका में शांति सेना भेजी, जिसके परिणामस्वरूप लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम  के साथ खुला संघर्ष हुआ 1989 के चुनाव में उनकी पार्टी हार गई ।

राजीव गांधी ने मैदान नहीं छोडा. राजीव गांधी 1991 के चुनावों तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहे । चुनाव प्रचार के दौरान, लिट्टे के एक आत्मघाती हमलावर ने उनकी हत्या कर दी । 1991 में, भारत सरकार ने गांधी को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया । 2009 में इंडिया लीडरशिप कॉन्क्लेव में, गांधी को मरणोपरांत आधुनिक भारत के क्रांतिकारी नेता का पुरस्कार प्रदान किया गया.

राजीव गांधी दुस्साहसी नेता थे.1986 में उन्होने सेशेल्स के राष्ट्रपति फ्रांस-अल्बर्ट रेने के अनुरोध पर , तख्तापलट की कोशिश का विरोध करने के लिए भारत की नौसेना को सेशेल्स भेजा। भारत के हस्तक्षेप ने तख्तापलट को टाल दिया। इस मिशन को ऑपरेशन फ्लावर्स आर ब्लूमिंग नाम दिया गया था । 1987 में, भारत ने ऑपरेशन राजीव जीतने के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा के विवादित सियाचिन क्षेत्र में कायद पोस्ट पर फिर से कब्जा कर लिया । 1988 के मालदीव तख्तापलट में , मालदीव के राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम ने गांधी से मदद मांगी। उन्होंने 1500 सैनिक भेजे और तख्तापलट को दबा दिया गया। 

संयुक्त राष्ट्र महासभा के पंद्रहवें विशेष सत्र में  राजीव गांधी ने परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व पर अपने विचार व्यक्त किए, जिसे 'परमाणु-हथियार मुक्त और अहिंसक विश्व व्यवस्था की शुरुआत के लिए कार्य योजना' के माध्यम से साकार किया जाना था। मै राजीव गांधी का गुणगान करने के लिए ये लेख नहीं लिख रहा. मेरा मकसद आज की पीढी को ये बताना है कि यदि देश को युवा नेतृत्व मिले तो कमाल भी हो सकता है.

राजीव गांधी की देशी, विदेशी नीति सफल थी या असफल इसके लिए आपको अतीत में जाना पडेगा, मै तो एक ही बात कह सकता हूँ कि यदि राजीव गांधी की हत्या न की गई होती तो वे दोबारा सत्ता में आते और अपनी गलतियों को शायद सुधारते. 

राजीव गांधी वैश्विक पर्यटक नहीं थे. अहंकारी तो बिलकुल नहीं थे. उनकी हत्या से ठीक तीन दिन पहले भिंड शहर में एक चुनाव सभा के बाद हमने उनसे बातचीत की थी. वे प्रेस से भागने या बचने वाले नेता नही थे. बहरहाल उनके जन्मदिन पर उनका स्मरण करना मुझे अच्छा लगा. शायद आपको भी अच्छा लगे.

@ राकेश अचल

सोमवार, 18 अगस्त 2025

नेहरू के राधाकृष्णन और मोदी के राधाकृष्णन

 


भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को पानी पी पीकर भले ही कोसते हों लेकिन संकट की हर घडी में नेहरू ही भाजपा और मोदी की मदद करते हैं. मोदी ने उपराष्ट्रपति पद के लिए नेहरू की कल करते हुए न सिर्फ तमिलनाडु से प्रत्याशी को चुना बल्कि  उसी उप नाम का व्यक्ति चुना जिसका उपनाम राधाकृष्णन है.मोदी जी के राधाकृष्णन में और नेहरू जी के राधाकृष्णन में जमीन -आसमान का अंतर है.

मोदी जी के राधाकृष्णन चंद्रपुरम पोन्नुसामी राधाकृष्णन 68 साल के हैं और महज बीबीए कर पाए. हालांकि उन्होने अपने उद्यम से कोई 70 करोड की पूंजी जमा कर रखी है. मोदीजी के राधाकृष्णन 2024 से महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं वह भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं और कोयंबतूर से दो बार लोकसभा के लिए चुने गए थे।मोदीजी के राधाकृष्णन तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी हैं और उन्हें पार्टी ने केरल भाजपा प्रभारी नियुक्त किया गया था।वह 2016 से 2019 तक अखिल भारतीय कॉयर बोर्ड के अध्यक्ष थे, जो लघु, कुटीर एवं मध्यम उपक्रम मंत्रालय (एमएसएमई) के अधीन है।


मोदी जी के राधाकृष्णन लोकसभा के दो बार सदस्य रहे ।1998 के कोयंबतूर बम धमाकों के बाद 1998 और 1999 के आम चुनावों में उन्होंने भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की.राधाकृष्णन 1998 में 150,000 से अधिक मतों के अंतर से और 1999 के चुनावों में 55,000 के अंतर से जीते।

मोदीजी के राधाकृष्णन ने तमिलनाडु में भाजपा के लिए जमीन तैयार करने में खूब श्रम किया, लेकिन उन्ही की वजह से भाजपा का डीएमके से गठबंधन भी टूटा.

मोदीजी के राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता पर हमला करने वाले दोषियों के खिलाफ निष्क्रियता का विरोध करने के लिए मेट्टुपालयम में गिरफ्तारी दी।वे दक्षिण और तमिलनाडु से भाजपा के सबसे वरिष्ठ और सम्मानित नेताओं में से हैं और 16 साल की उम्र से 1973 से 48 साल तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से सीधे संगठन से जुड़े रहे हैं। 

भाजपा ने सीपी राधाकृष्णन को चुनते समय भी लाभ- हानि का गणित लगाया.सीपी राधाकृष्णन हर मामले में फिट बैठते हैं. वे तमिलनाडु के नेता हैं. भाजपा और आरएसएस की विचारधारा से जुड़े हुए हैं.राज्य के शहरी और उच्च जातीय वर्ग में उनकी स्वीकार्यता है.उपराष्ट्रपति जैसे बड़े पद पर बैठाने से भाजपा तमिल समाज को संदेश देना चाहती है कि दिल्ली की सत्ता में उनका भी हिस्सा है.

भाजपा यहां से एक नेशनल कनेक्ट बनाकर दिखाना चाहती है कि दक्षिण का नेता भी पश्चिमी भारत में शासन संभाल सकता है और अब दिल्ली में नंबर दो पद पर आसीन है.आपको बता दें कि तमिलनाडु की राजनीति में जाति का वजन बहुत अहम है.तमिल राजनीति पर ओबीसी और द्रविड़ जातियां  हावी हैं लेकिन ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी कम है,  भाजपा को लगता है कि  ब्राम्हण ही उसका प्राकृतिक  कैडर बेस है, क्योंकि द्रविड़ दलों की एंटी-ब्राह्मण राजनीति ने इस वर्ग को हाशिए पर धकेला. भाजपा को उपराष्ट्रपति पद के लिए सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसा उदभट विद्वान नहीं चाहिए उसे तो वोटों की फिक्र है राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति बनाने से भाजपा ब्राह्मण वोटरों के साथ-साथ उस शहरी, पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग तक पहुंच बनाना चाहती है, जो अभी भी डीएमके या एआईएडीएमके की राजनीति से दूरी रखता है.

पूर्व में भी तमिलनाडु के नेताओं को केंद्र की राजनीति में अहम पद मिले हैं. डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन पहले उपराष्ट्रपति फिर राष्ट्रपति बने.आर. वेंकटरमण राष्ट्रपति भवन तक पहुंचे. कई नेता मंत्री और स्पीकर रहे.

अब आइए आपको पंडित जवाहरलाल नेहरू के राधाकृष्णन से मिलवाते हैं. नेहरू के राधाकृष्णन 64 वर्ष की उम्र में उपराष्ट्रपति बने थे.डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी ग्राम के एक तेलुगुभाषी ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था।

 नेहरू के राधाकृष्णन शुद्ध शिक्षाविद और दार्शनिक थे. वे परास्नातक होने के साथ ही पीएचडी उपाधिधारक भी थे. वे 21वर्ष की उम्र में सहायक व्याख्याता बन गये थे.

नेहरू के राधाकृष्णन आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी व्याख्याता रहे. वे कलकत्ता, आंध्र, काशी और दिल्ली विश्वविद्यालयों के चांसलर रहे. संविधान सभा के सदस्य रहे. सोवियत संघ में भारत के राजदूत रहे. 1954 में उन्हे भारतरत्न से अलंकृत किया गया. नेहरू के राधाकृष्णन का जन्मदिन देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है.नेहरू के राधाकृष्णन चुनावी राजनीति से सदैव दूर रहे. वे न चुनाव लडे और न किसी दल का चुनाव प्रचार करने गये. वे उच्चकोटि के लेखक भी थे. नेहरू के राधाकृष्णन नेहरू के सामने भी तनकर चल सकते थे लेकिन मोदी के राधाकृष्णन की ये हैसियत नही कि वे मोदी जी के हाथ में हाथ डालकर एक कदम भी चल सकें.

अब भाजपा अपने राधाकृष्णन सीपी को नेहरू के राधाकृष्णन सर्वपल्ली जितना न पढा सकती है और न उदभट विद्वान बना सकती है. तमिलनाडु के ब्राह्मण भी शायद ही मोदीजी के राधाकृष्णन के प्रति उतने श्रद्धानवत हों जितने कि नेहरू के राधाकृष्णन के प्रति हैं. मोदी के राधाकृष्णन तो पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड का भी किसी भी पैमाने पर मुकाबला नहीं कर सकते. बहरहाल सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने साबित कर दिया कि उसके पास बौद्धिक संपदा नगण्य है. उसे हर हाल में, हर पद पर केवल और केवल शाखामृग चाहिए. जिस गद्दी पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन बैठे उसी पर एक कारैबारी राधाकृष्णन को बैठे देखना भारत की विवशता है.

@राकेश अचल

रविवार, 17 अगस्त 2025

कब रुकेगा केंद्र और सर्वोच्च न्यायालय का टकराव


देश के सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र के बीच का टकराव भी अब सनातन हो चला है. ये टकराव कांग्रेस की सरकारों के समय भी था और आज भाजपा की लंगडी सरकार के समय में भी है, बल्कि आज ये टकराव कुछ ज्यादा ही तेज हो गया है.राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों पर मंजूरी या रोक लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र की तीखी प्रतिक्रिया से इसटकराव की आवाजें साफ सुनी जा सकती हैं.
आपको बता दें कि केंद्र ने कहा कि शीर्ष अदालत का यह फैसला संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों के दायरे में अनुचित दखल है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन को अस्थिर कर सकता है। केंद्र ने अपनी लिखित दलीलों में कहा, “विस्तृत न्यायिक पुनरीक्षण की प्रक्रिया संवैधानिक संतुलन को अस्थिर कर देगी और तीनों अंगों के बीच संस्थागत पदानुक्रम पैदा कर देगी। न्यायपालिका हर संवैधानिक पेचीदगी का समाधान नहीं दे सकती।”
8 अप्रैल को जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर निर्णय की समयसीमा तय की थी तथा तमिलनाडु के 10 विधेयकों को ‘डिम्ड असेंट’ घोषित कर दिया था। केंद्र ने कहा कि अनुच्छेद 142 अदालत को ऐसा करने की अनुमति नहीं देता और यह संवैधानिक प्रक्रिया को उलटने जैसा है।
केंद्र ने कहा,  है कि “राष्ट्रपति और राज्यपालों के निर्णयों पर न्यायिक शक्तियों का उपयोग करना न्यायपालिका को सर्वोच्च बना देगा, जबकि संविधान की मूल संरचना में ऐसा नहीं है। तीनों अंग (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) एक ही संवैधानिक स्रोत से शक्ति प्राप्त करते हैं और किसी को भी दूसरों पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है।”केंद्र का मानना है कि विधेयकों से जुड़े सवालों के समाधान राजनीतिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक उपायों से होने चाहिए, न कि न्यायिक आदेशों से। उसने कहा कि संविधान ने जहां आवश्यक समझा, वहां समयसीमा का उल्लेख किया है, पर अनुच्छेद 200 और 201 में कोई समयसीमा नहीं दी गई है। ऐसे में न्यायालय द्वारा तय की गई समयसीमा असंवैधानिक है।
मजे की बात ये है कि जिस सबसे बडी अदालत को पूरा देश सर्वोच्च मानता है उसके फैसले ही अब केंद्र को आपत्तिजनक लगने लगे हैं.केंद्र ने  कहा कि राज्यपाल न तो राज्यों में बाहरी व्यक्ति हैं और न ही केवल केंद्र के दूत। वे राष्ट्रीय हित और लोकतांत्रिक भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं।
केंद्र की ये तकरार कम, ज्यादा होती आई है. श्रीमती इंदिरा गांधी हों या राजीव गांधी सभी ने सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता को न सिर्फ चुनौती दी बल्कि धता भी बताया. मौजूदा मोदी सरकार इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से भी चार कदम आगे बढ गए हैं. मोदीजी की सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट भी उसके इशारों पर वैसे ही काम करे जैसे ईडी, सीबीआई और सीईसी कर रहे हैं. राम मंदिर मस्जिद विवाद में  तबके सुप्रीम न्यायाधीशों ने ये किया भी. बदले में राज्यसभा की सीट भी हासिल की.
आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड कानून पर अपना फैसला अभी नही सुनाया है. इस बीच बिहार के बहुचर्चित वोट चोरी कांड यानि एस आई आर की बखिया भी उधेड दी है, इससे भी मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट को लेकर न सिर्फ असहज है वरन आक्रामक भी है. केंद्र ने इससे पहले तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड और राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू के जरिए भी सुप्रीमकोर्ट को हडकाने का दुस्साहस किया था, किंतु सुप्रीमकोर्ट दबाब में नहीं आया. वर्तमान मुख्यन्यायाधीश जस्टिस बिआर गवई न पूर्व के सीजेआई की तरह मोदीजी को अपने घर किसी पूजा में बुला रहे हैं और न ही उन्होने अपनी सेवानिवृति के बाद कोई सरकारी, असरकारी पद की अपेक्षा की है. देखना होगा क अब सुप्रीमकोर्ट और केंद्र के बीच का टकराव कौन सी करवट लेता है?
@ राकेश अचल

राजनीति मे अजातशत्रु थे अटल‌जी : पिरोनिया

 बाजपेई ब कुशाभाऊ ठाकरे को याद किया

 उन्नाव । भाजपा विधानसभा क्षेत्र के उन्नाव मंडल में आज भारत अटल बिहारी वाजपेई एवं पुण्यतिथि एवं कुसाभाऊ ठाकरे की जयंती बूथ स्तर पर मनाई गई ।  मंडल के ग्राम सेरसा मैं पित्तृ पुरुषों के चित्रों पर माल्यार्पण करने के बाद कार्यकर्ताओं को स्मरण कराते हुए पूर्व विधायक घनश्याम पिरोनिया ने कहा कि भारत रत्न  अटल बिहारी वाजपेई राजनीति में अजातशत्रु थे । जिन्होंने कभी भी हिंदुस्तान के हितों से समझौता नहीं किया, राजस्थान के पोखरण में परमाणु विस्फोट, करके दुनिया को भारत की शक्ति से परिचित कराया । अटल बिहारी वाजपेई की सरकार को षडयंत्र पूर्वक एक वोट से कांग्रेस के लोगों ने लोकतंत्र का गला घोटकर सरकार गिराई थी । कार्यक्रम को मंडल अध्यक्ष दिनेश घरावा ने संबोधित करते हुए कहा कि अभी-अभी देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है जिस स्वप्न को कभी हमारे पित्त पुरुष अटल व ठाकरे जी ने  देखा था वह सने सने साकार होता जा रहा है । मोदी जी की जनहितैषी योजनाएं हमारे पित्तृ पुरुषों के उस समय लिए गए संकल्प की याद दिलाती है । अटल जी ने रजत शर्मा के शो में कहा था कि आज हम पर हंसने वाले लोग ध्यान रखें कल पूरा देश उन पर हंसेगा । कार्यक्रम को पूर्व मंडल अध्यक्ष कुशलपाल गुर्जर, रामजी पटेल ने भी संबोधित किया । इस अवसर पर यतेंद्र गुर्जर सो ग्राम यादव सुनील पांचाल अंशुल पांचाल राम दुलारे दुबे शंकर झा लालाराम पाल जितेंद्र पाल हेमंत यादव राजेश पाल कोमल पाल दीपक राय विजय दुबे आदि कार्यकर्ता उपस्थित रहे ।

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