गुरुवार, 31 जुलाई 2025

हमारा शहर : बिना फुटपाथ-नाली का शहर है शहर क्या है, रुदाली का शहर है



हमारा शहर

 

बिना फुटपाथ-नाली का शहर है

शहर क्या है, रुदाली का शहर है

🙏

नहीं करता है सीधी बात कोई 

तमंंचों का दुनाली का शहर है

🙏

यहाँ ऊंचे किले, ऊंचे महल हैं

शहर बेढी प्रणाली का शहर है

🙏

पुलिस असहाय है, असहाय जनता

निलंबन का, बहाली का शहर है

🙏

सभी मदहोश हैं, किससे कहें क्या 

यकीनन ये अलाली का शहर है

🙏

यहाँ हर काम की कीमत मुकर्रर

ये रिश्वत का, दलाली का शहर है

🙏

बडे अजगर हैं जननेता हमारे 

उन्ही की हर अलाली का शहर है

🙏

यहाँ थी गूजरी रानी सुना है

नहीं ये आम्रपाली का शहर है

🙏

@ राकेश अचल

टैरिफ की मार झेलो, ट्रंप के खिलाफ मत बोलो

 माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी को कसम है कि जो वे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ एक शब्द  भी बोलें. उनके मौन के साथ देश की 140 करोड जनता है जो अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गये 25 फीसदी टैरिफ की मार को झेल सकती है. अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील को लेकर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा ऐलान कर  दिया है.भारत पर अमेरिका ने 25 फीसदी टैरिफ लगाया है. अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इसका ऐलान किया है. ट्रंप ने बताया कि 1 अगस्त से भारत पर ये लागू होगा. 

 ट्रंप साहब हमारे साहब मोदी जी के पुराने यार हैं उनकी यारी जंजीर फिल्म के नायक अमिताभ बच्चन और शेरखान प्राण की दोस्ती जैसी है.'यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी ' जैसी दोस्ती. ये दोस्ती दांत- काटी इसलिए नहीं कह सकता क्योंकि इसकी कोई तस्वीर हमारे पास नहीं है. वैसे भी मोदी जी का दिल दोस्तों के अहसान का मारा दिल है.'अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तो'की तरह का.

आपको पता है कि ट्रेड डील को लेकर भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही थी. ट्रंप साहब डील को लेकर भारत को तारीख पर तारीख दे रहे थे. उन्होने आपरेशन सिंदूर के दौरान भी भारत का गला पकडा था लेकिन मोदी जी लगातार डील से बचते रहे. वे उस कहावत को भूल गये कि -'बकरे की अम्मा चाहे जितना खैर मना ले लेकिन एक न एक दिन बकरा हलाल होता ही है.अब जाकर खुद ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एकतरफा टैरिफ की जानकारी दे दी है.

माननीय डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि भारत हमारा मित्र है, लेकिन हमने भारत के साथ पिछले कई वर्षों में अपेक्षाकृत कम व्यापार किया है, क्योंकि उनके टैरिफ बहुत अधिक हैं, दुनिया में सबसे अधिक हैं. जो कि अमेरिका को व्यापार बढ़ाने में रोकता है.  ट्रंप की मानें तो भारत लगातार सैन्य उपकरण रूस से खरीदते आया है, जो कि सही नहीं है. हर कोई चाहता है कि रूस यूक्रेन पर हमला रोके, लेकिन भारत रूस से लगातार व्यापार को बढ़ा रहा है, जो कि सही कदम नहीं है. इसलिए इन सभी मामलों को देखते हुए अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने का फैसला किया है, और ये 1 अगस्त से लागू हो जाएगा. 

आंकडे बताते है कि इस वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में अमेरिका को भारत का निर्यात 22.8 प्रतिशत बढ़कर 25.51 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात 11.68 प्रतिशत बढ़कर 12.86 अरब डॉलर हो गया.

 इस मामले में प्रधानमंत्री श्री मोदीजी या उनकी कैबिनेट के किसी मंत्री ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. संसद के मानसून सत्र में भी कोई कुछ बोल दे तो गनीमत समझिये, हालांकि भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने कहा है कि "भारत सरकार निश्चित रूप से इस पर कुछ कदम उठाएगी. भारत सरकार अमेरिकी प्रशासन से भी बातचीत कर सकती है. इस फैसले के बाद, चीजें निश्चित रूप से महंगी हो जाएंगी. हमें यह स्टडी करना होगा कि इसका बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा.प्रवीण सर की भाजपा में क्या हैसियत है ये हमें नहीं पता लेकिन वे इसे दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं और उन्हे उम्मीद है कि ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन को जल्द ही इसका एहसास होगा और वे इस फैसले को वापस ले लेंगे."

जानकार बताते हैं कि अमेरिका द्वारा थोपे गये टैरिफ और जुर्माने की वजह से भारतीय वस्तुओं एवं सेवाओं का अमेरिका में निर्यात करना महंगा होगा। इससे भारतीय वस्तुओं की अमेरिका के अंदर मांग तेजी से घटेगी। हालांकि, वार्ता की शुरुआत में दोनों देश ने सितंबर-अक्टूबर तक पहले चरण के समझौते को पूरा करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब समझौता कई स्तर पर फंसा है। इस समझौते का लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 500 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का है।

आपको याद दिला दूं कि इसी वर्ष फरवरी में अमेरिकी में ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते करने पर सहमति जताई थी।उसके बाद दोनों पक्षों के बीच वार्ता शुरू हुई। अभी तक पांच दौर की वार्ता हो चुकी है। अंतिम दौर की वार्ता वाशिंगटन में हुई लेकिन उसमें कोई नतीजा नहीं निकल सका। अब छठे दौर की वार्ता 25 अगस्त से भारत में होनी है।ये वार्ता परिणाम मूलक होना चाहिए, अन्यथा भारतीय नेतृत्व के लिए शर्म से डूब मरने वाली बात होगी.

वैसे हमारे मोदीजी ने ट्रंप के लिए क्या कुछ नहीं किया?भारत में 140 करोड पलक पांवडे बिछाए, हाउडी खेली, अमेरिका जाकर चुनाव प्रचार किया और बदले में उन्हे मिला क्या टैरिफ, जुर्माना? अब तो वो फिल्मी गीत याद आ रहा है-'अच्छा सिला दिया तू ने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का '.

@राकेश अचल

बुधवार, 30 जुलाई 2025

अब सिंदूर स्प्रिट से चलाइए अपना काम

मुझे ज्यादा अंग्रेजी नहीं आती, बस जैसे तैसे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की तरह काम चला लेता हूँ. जब छोटा था तब स्प्रिट का मतलब उस रसायन को मानता था जो डाक्टर मरीज को इंजेक्शन लगाने से पहले बांह या पुठ्ठे पर रगते थे. बडा हुआ तो स्प्रिट को नशे के रूप में पहचाना लेकिन स्प्रिट का सही हिंदी अर्थ पत्रकारिता में आने के बाद जान पाया.

हमारे यहाँ कोई भी क्षेत्र हो सबसे ज्यादा स्पोर्ट्स मैन स्प्रिट के सहारे आगे बढता है. हिंदी वाले स्प्रिट को भावना कहते हैं. बढे बूढे अक्सर कहते थे जो करो खेल भावना से करो. खेल भावना शायद तमाम भावनाओं में सबसे ज्यादा सात्विक होती होगी, तभी तो राजनीति हो, समाज सेवा हो, नौकरी हो, व्यवसाय हो, सब जगह इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है. कोई इस भावना का इस्तेमाल करता है तो कोई नहीं करता.

पिछले एक दशक से देश में स्पोर्ट्समैन स्प्रिट की जगह नेशनलिज्म स्प्रिट से काम करने को कहा जा रहा है, लेकिन 22अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम नरसंहार के बाद देश के खून में सिंदूर क्या मिला तमाम स्प्रिट्स हल्की पड गई. संसद के मानसून सत्र में आपरेशन सिंदूर पर हुई लंबी बहस का जबाब देते हुए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने ऐलान किया है कि अब भारत सिंदूर स्प्रिट से चलेगा. चूंकि मोदी जी ने आव्हान किया तो कम से कम देश की आबादी के बीस-पच्चीस फीसदी ंधभक्त तो सिंदूर स्प्रिट से काम करना शशुरु कर देंगे.

सिंदूर स्प्रिटदर असल स्प्रिट का नया ब्रांड है, इसलिए आप चौंकिए नहीं. मुझे एक ही आशंका सता रही है कि मोदी जी के आव्हान के बाद देश में कहीं अचानक से सिंदूर के भाव न बढ जाएं. मोदीजी भूल गये शायद कि बंगाल हो या बिहार युगों से सिंदूर स्प्रिट से काम करते हैं. अब पूरे देश में सिंदूर स्प्रिट क खेला चलेगा. मुमकिन है कि जनता बाद में इस सिंदूर स्प्रिटट को कहीं मोदी ' स्प्रिट न कसने लग जाएं. हमारे यहाँ भेडचाल लोकप्रिय जो है. संस्कृत वाले इसे 'महाजने येन गत:स पंथ'कहते हैं

आपको बता दू कि हमारे यहाँ स्प्रिट यानि भावना के अनेक प्रकार हैं. सबसे ज्यादा कोमल धार्मिक भावना होती है जो मामूली सी बात से आहत यानि हर्ट हो जाती है. हमारे लंकेश पंडित जी बताते थे कि  स्प्रिट या भावना (spirit) को दार्शनिक, आध्यात्मिक, या मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा और समझाया जा सकता है.। भावना के प्रकार को सामान्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है:भारत मेंभक्ति भावना बहुत प्रबल मानी जाती है.ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण और श्रद्धा इसका मल तत्व है.प्रचलित भावनाओं में प्रेम और करुणा  भावना सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और दया के संदर्भ में प्रयोग की जाती है.हमारे यहां एक मानसिक/भावनात्मक भावना (Emotional Spirit)भी होती है.एक रचनात्मक भावना (Creative Spirit) भी होती है.

हिंदू दर्शन में, आत्मा (आत्मन) को अनंत और अजर-अमर माना जाता है, जो विभिन्न भावनाओं का आधार है। भावनाएँ  हकीकत में मानव मन की स्थिति हैं, जो सकारात्मक (खुशी, प्रेम) या नकारात्मक (क्रोध, भय) हो सकती हैं। विभिन्न संस्कृतियों में "स्प्रिट" का अर्थ अलग हो सकता है, जैसे उत्सव की भावना.

मै तो अब सिंदूर स्प्रिट का अध्ययन कर रहा हूँ. मुझे तय करना पडेगा कि मै  स्पोर्ट्स मैन स्प्रिट से ही चिपका रहूं या फिर सिंदूर स्प्रिट से लिखूं.? आजकल सिंदूर को लेकर महिलाओं में मतैक्य नहीं है. कुछ मांग में चुटकी भर सिंदूर भरती हैं तो कुछ रत्ती भर. कुछ बीच मांग में सिंदूर भरतीं हैं तो कुछ सांकेतिक ढंग से सिंदूर बापरतीं हैं. बिहार में महिलाएं नाक तक सिंदूर लगालेती हैं तो बंगाल में तो सिंदूर खेला ही हो जाता है.

मोदी जी का सिंदूर प्रेम जगजाहिर है. उनकी तो रगों में गर्म सिंदूर प्रवाहित हो रहा है. डाक्टर परेशान हैं क्योंकि अभी तक चिकित्सा विज्ञानं में सिंदूरी खून की जांच की कोई पैथिलोजिकल किट तैयार नही की गई है. बहरहाल सिंदूर स्प्रिट देश की अधिभान्य स्प्रिट हो चुकि है इसलिए इसका  सम्मान कीजिये.

@  राकेश अचल

मंगलवार, 29 जुलाई 2025

वर्षा जल निकासी के लिये नालों से हटाया अतिक्रमण

 

ग्वालियर  29 जुलाई ।  नगर निगम के मदाखलत अमले द्वारा सुगम यातायात एवं नागरिकों की सुविधा के लिए निरंतर अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही है। 

 ट्रांसपोर्ट नगर, क्षेत्रान्तर्गत वार्ड क्रमांक- 64 ग्वालियर ग्रामीण पर बारिश के पानी के जल भराव की निकासी हेतु नाले, नाली के ऊपर रखी गुमटियों, अस्थाई छ्प्परो, चार पहिया वाहन बॉडियो, रखे सामान इत्यादि एवं अन्य अस्थाई अतिक्रमण को जे.सी.बी मशीन एवं मदाखलत अमले द्वारा हटवाया गया जिससे यातायात व्यवस्था एवं वर्तमान में अधिक वर्षा का जल भराव से नागरिकों एवं आमजन को परेशानी ना हो को देखते हुए स्थाई एवं अस्थाई अतिक्रमण को हटाने की कार्यवाही की गई। उक्त कार्यवाही में नगर निगम के सहायक यंत्री श्री रजनीश गुप्ता, सहायक यंत्री श्री राकेश कुशवाहा, भवन अधिकारी श्री राजीव सोनी, क्षेत्राधिकारी श्रीमती शिल्पा दिनकर, मदाखलत अधिकारी श्री रवि कुमार कोरी, सहायक स्वास्थ्य अधिकारी श्री विवेक त्यागी, मदाखलत निरीक्षक श्री श्रीकांत सेन, मदाखलत निरीक्षक ग्वालियर विधानसभा क्षेत्र श्री आजाद खान सहित दल (ग्रामीण), दल (ग्वालियर) एवं क्षेत्रीय कार्यालय का सम्बधिंत स्टाफ के साथ सम्बंधित थाना बहोडापुर का पर्याप्त मात्रा में पुलिस बल तथा ट्रांसपोर्ट नगर यूनियन के पदाधिकारी गण मौजूद रहे।

कलेक्ट्रेट में हुई जन-सुनवाई में 111 लोगों की समस्यायें सुनी

 ग्वालियर 29 जुलाई ।  कलेक्ट्रेट में हुई जन-सुनवाई में 111 लोगों की समस्यायें सुनी गईं। कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान एवं अपर कलेक्टर श्री कुमार सत्यम सहित जिला प्रशासन के अन्य अधिकारियों ने एक – एक कर सभी आवेदकों की समस्यायें सुनीं और उनके आवेदनों के निराकरण की रूपरेखा तय की। 

जन-सुनवाई में प्राप्त हुए 111 आवेदनों में से 45 दर्ज किए गए। शेष 66 आवेदन संबंधित विभागों के जिला स्तरीय अधिकारियों को सीधे ही निराकरण के लिये दिए गए। सभी अधिकारियों को समय-सीमा में आवेदनों का निराकरण करने के निर्देश दिए गए हैं। जन-सुनवाई में स्कूलों में प्रवेश, राजस्व, नगर निगम, जल भराव, बिजली इत्यादि से संबंधित समस्यायें प्राप्त हुईं। जमीन संबंधी समस्याओं के त्वरित निराकरण के निर्देश सभी एसडीएम व तहसीलदारों को दिए गए। जन-सुनवाई में मदद की आस में पहुँचे जरूरतमंदों के नि:शुल्क इलाज का इंतजाम भी कराया गया। 

संसद में बहस:सवाल भी सरकारी और जबाब भी

 

हमने जब लिखना-पढना शुरू किया था तब संसद की कार्रवाई सजीव देखने को नहीं मिलती थी.इसके लिए या  तो संसद की पत्रकार दीर्घा में बैठो या अतिथि दीर्घा में. जो दिल्ली से दूर थे उन्हे संसद समीक्षा सुनने के लिए आकाशवाणी पर रात ग्यारह बजे तक जागना पडता था अन्यथा संसद की कार्रवाई की रपट अगले दिन अखबार में ही पढने को मिलती थी.हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि आम आदमी घर बैठे टीवी पर और चलते-फिरते मोबाइल पर संसद की बहसें सुन और देख पाएगा.

आपको बता दें कि संसद के भीतर की कार्रवाई हमने पत्रकार बनने के दस साल बाद देखी.भारत में संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण 20 अगस्त 1989 को शुरू हुआ। इस दिन पहली बार लोकसभा की कार्यवाही का रेडियो पर सीधा प्रसारण किया गया था। इसके बाद, 25 अगस्त 1994 से लोकसभा की कार्यवाही का टेलीविजन पर सीधा प्रसारण शुरू हुआ। राज्यसभा की कार्यवाही का टेलीविजन पर सीधा प्रसारण 7 दिसंबर 1994 से शुरू हुआ। यह प्रसारण दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से किया गया, और बाद में लोकसभा टीवी (2006 में शुरू) और राज्यसभा टीवी (2011 में शुरू) जैसे समर्पित चैनलों ने इसे और व्यापक बनाया।

इस हिसाब से पिछले 45 साल में हमने संसद में पहली बार देखा और सुना कि एक तो बहस सत्तापक्ष ने शुरु की और दूसरे खुद ही सवाल गढे और खुद ही उनके जबाब भी दे दिए. ये संसदीय इतिहास की संभवतः पहली उलटबांसी है. सरकार ने विपक्ष को बताया कि उसे कैसे सवाल करना चाहिए और कैसे नहीं? संसद के मौजूदा मानसून सत्र में बहुचर्चित, विवादित आपरैशन सिंदूर पर बडी ना - नुकुर के बाद सरकार बहस के लिए राजी हुई लेकिन बहस का बिस्मिल्लाह खुद सरकार ने किया. सरकार को लगा कि एक नयी परंपरा शुरू कर विपक्ष के सवलों से बचा जा सकेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

आठ घंटे की बहस में सरकार खुद अपने तथ्यों से उलझ गई. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक प्रधानाचार्य की तरह बहस का आगाज जिस ढंग से किया उससे समझ में आ गया कि वे जो भी बोल रहे हैं वो दिल से नहीं बोल रहे. उनसे जबरन बुलवाया जा रहा है. ठीक उसी तरह जैसे कुछ दिन पहले उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड से इस्तीफा लिखवाया गया था. राजनाथ अनाथ और असहाय नजर आ रहे थे. वे संसद के भीतर-बाहर उठाए जा रहे एक भी सवाल का जबाब नहीं दे पाए, उलटे वे आपरेशन सिंदूर में लडाकू विमानों के गिराए जाने के अमरीकी दावे की यह कहकर पुष्टि कर बैठे कि -'  परीक्षा में अच्छे अंक लाते समय पेंसिल टूटती है, रबर घिसती है '.

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष को और देश को ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी को भी निराश किया. भावुक राजनाथ सिंह ये सच भी कह गये कि भाजपा हो या कोई और दल हमेशा सत्ता में नहीं रह सकता. हम भी नहीं रहेंगे. रक्षामंत्री भूल गए कि मोदी-शाह की जोडी तो अगले पचास साल तक सत्ता छोडना ही नहीं चाहती. रक्षामंत्री की रसना सूख रही थी, सफेद झूठ बोलते हुए लडखडा रही थी. उन्हे पानी पीकर उसे गीला करना पडा.

संसद में किसने क्या कहा, ये पूरे देश ने देखा और सुना है इसलिए मै उसकी व्याख्या नही करना चाहता. मै तो ये रेखांकित करने की कोशिश कर रहा हूँ कि एक घबडाई हुई ढीट सरकार कैसे अपने ही बिछाए जाल में उलझती चली जाती है.देश के अब तक के सबसे कमजोर विदेश मंत्री एस जयशंकर के बचाव में तो खुद देश के गृहमंत्री अमित शाह को खडा होना पडा. वे दुखी होकर बोले कि आपको देश के विदेश मंत्री पर भरोसा नही है? अब शाह को कौन यकीन दिलाए कि देश का विश्वास तो खुद प्रधानमंत्री माननीय मोदीजी खो चुके हैं. यदि ऐसा न होता तो वे आज एक बैशाखियों वाली सरकार न चला रहे होते.

मैने एस जयशंकर से पहले विदेश मंत्री के रुप में एस एम कृष्णा, प्रणव मुखर्जी, डॉ मनमोहन सिंह, नटवर सिंह, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, इंद्रकुमार गुजराल, पीवी नरसिम्हाराव,अटल बिहारी वाजपेयी को देखा है, उनसे पहले यशवंत राव चव्हाण, और स्वर्ण सिंह का नाम सुना था. लेकिन एस जयशंकर जैसा मिमियाने वाला विदेश मंत्री पहली बार देखा. जयशंकर ने सरकार को सदन के बाहर भी उलझाया और सदन के भीतर भी. आपको याद होगा कि इन्ही विदेश मंत्री ने देश को बताया था कि आपरेशन सिंदूर शुरू करने से पहले पाकिस्तान को विधिवत इसकी इत्तला दी गई थी. ये ही विदेश मंत्री सदन में कह गये किआपरेशन सिंदूर के चलते 9 मयी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति वेंस ने प्रधानमंत्री मोदी को बताया था कि पाकिस्तान भारत पर बडा हमला करने वाला है. इसका मतलब साफ है कि भारत सरकार की इंटेलीजेंस को कुछ पता ही नहीं था.

बहरहाल आप इस बहस के अंत में देश के प्रधानमंत्री का एक खीज भरा प्रवचन जरूर सुनेंगे जिसमें विपक्ष के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होगा. माननीय प्रधानमंत्री सदन में कांग्रेस के अतीत का मुजाहिरा करेंगे लेकिन आपरेशन सिंदूर, सीज फायर को लेकर न ट्रंप साहब का नाम अपनी जबान पर आने देंगे और न  चीन का. संसद अब झूठ कहने और झूठ सुनने के लिए अभिशप्त हो गई है. संसद में अब एक भी ऐसा सूरमा नहीं है जो देश के धमकीबाज मंत्रियों से कह पाए कि-चुप हो जाओ, जितनी तुम्हारी उम्र है उससे ज्यादा हमने राजनीति की है्. अब सदन में न चंद्रशेखर हैं, न लालू यादव. न मुलायम सिंह हैं न शरद यादव.

@ राकेश अचल

सोमवार, 28 जुलाई 2025

ई-रिक्शा :खस्ताहाल सडकों पर अराजकता

मुझे पता है कि हमारी संसद में ई रिक्शा को लेकर कोई बहस नहीं करने वाला, क्योंकि हमारी संसद ब, स के लिए बनी ही नहीं है शायद. इसीलिए ई रिक्शों के नफा -नुक्सान पर लिखने की हिमाकत कर रहा हूँ. यदि आपके पास अपना वाहन नहीं है तो यकीन है कि ये आलेख आपके मतलब का होगा.

 देश के अमूमन हर शहर में ई-रिक्शा चालक ग्रीन परिवहन के नाम पर उतारे गये थे. ये ई रिक्शे उन लोगों को थमाए गये थे जो या तो तांगा, इक्का चलाते थे या हाथ रिक्शा. खटारा और धुआं उगलने वाले टेंपो का विकल्प भी समझे गये थे ये ईरिक्शे. बेआवाज ये ई रिक्शे शुरू में तो सभी को अच्छे लगे लेकिन अब यही ई रिक्शे देश के घरेलू परिलहन के लिए अराजक हो गये हैं..

पर्यावरण हितैषी परिवहन के नाम पर  प्रयोग में लाए जा रहे ये ई रिक्शे  यातायात को बद से बदतर बना रहे हैं। इनका न ढंग से पंजीयन हुआ, न चालकों का प्रशिक्षण. न इनके लिए स्टापेज बने और न मार्गों का निर्धारण किया गया, फलस्वरुप इन ई रिक्शा वालों को जहां सवारी ने हाथ दिया, वहीं रिक्शा रोक दिया, चाहे पीछे से आ रहे वाहन चालक दुर्घटना का शिकार हो जाएं। मप्र के पुराने सामंती शहरों के राजवाड़ा, महाराज बाडा जैसे इलाकों में  भले ही दो पहिया वाहन चलाने की जगह न हो, लेकिन इन्हें अपनी जगह पर वाहन खड़े करने की आजादी है।  ये न यातायात के नियम जानते हैं न इनके चालकों के पास कोई नागरिकता बोध. भले ही चाहे इनके कारण वाहनों की कतार लग जाए। 

लगभग हर शहर में प्रशासन ने इन पर सख्ती कर ई रिक्शों के लिए  रूट तय किए, रंग लगाकर पहचान देने की भी कोशिश भी की. ई रिक्शों को पालियों में भी चलवाने का प्रयास किया, लेकिन सब अकारथ गया., ई रिक्शा संचालकों के विरोध के बाद ये तमाम सख्ती हवा हो गई। इतना ही नहीं प्रशासन, यातायात पुलिस व आरटीओ ने भी अपनी जिम्मेदारी से हाथ खड़े कर दिए क्योंकि ई रिक्शा वालों के पीछे कानून के दुश्मन नेता आ खडे हुए.। अब सुविधा और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए लाये गये ई रिक्शै सिरदर्द बन गये हैं और खामियाजा आम जनता भुगत रही है

भारत में ई-रिक्शा की संख्या लाखों में हो सकती है, जिसमें पंजीकृत और गैर पंजीकृत दोनों शामिल हैं। 2022-23 तक के आंकड़ों के आधार पर, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कम से कम 3 लाख पंजीकृत ई-रिक्शा हैं, और गैर-पंजीकृत ई-रिक्शा की संख्या  कहीं अधिक हो सकती है।

शहरों में यातायात विभाग द्वारा पिछले कई वर्षों से वन-वे घोषित मार्गों पर ई-रिक्शा वाले बिना रोक टोक, बेधड़क  दौड़ते हैं.यातायात पुलिस एवं पुलिस खड़ी रहती हैं। जहां पहले तांगों, टेम्पो के कारण आम लोगों को परेशानी होती थी, अब इसकी जगह ई-रिक्शा ने ले ली है। हर शहर में ई-रिक्शा के अघोषित अस्थायी स्टैंड बन गये है। इससे बार-बार ट्रैफिक जाम होता रहता है। पैदल निकलने तक की जगह नहीं रहती है। ई रिक्शा वाले परम स्वतंत्र हैं.जहां से इच्छा हुई, वहीं से सवारी बैठा ली। कोई रोकने वाला नहीं है। रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन, घनी आबादी वाले क्षेत्र इनके अड्डे बनते जा रहे है.

सवाल ये है कि इन ई रिक्शा चालकों की अराजकता का इलाज क्या है? मैने दुनिया के अनेक गरीब, अमीर देश देखे हैं लेकिन वहाँ ई रिक्शा यदि हैं भी तो अराजक नहीं हैं. वे नियमों का पालन करते हैं, सभ्य हैं और उनमें भरपूर नागरिकता बोध भी है, लेकिन भारत में तो ई रिक्शा समस्या का दूसरा नाम बन गये हैं. कभी कभी तो मुझे ई रिक्शा की धींगामुश्ती देखकर अपने पारंपरिक तांगे वाले ज्यादा बेहतर लगते हैं. मुझे आशंका है कि देश में ई रिक्शा की बाढ के पीछे ई रिक्शा निर्माता कंपनियों और हरकारों के बीच कोई संधि भी लगती है. यदि ऐसा न होता तो जिलों के कलेक्टर, एसपी लाठी के बल पर तांगे, और साइकल रिक्शे क्यों हटवाते? हकीकत ये है कि ई रिक्शों की बाढ से पर्यावरण सुधरने के बजाय तेजी से बिगड रहा है. पर्यावरण के लिए ई रिक्शों का ई कचरा आने वाले दिनों में एक गंभीर समस्या होने वाला है. इसलिए इनका  हल खोजा जाना चाहिए.

@ राकेश अचल

रविवार, 27 जुलाई 2025

अराजकता की ओर बढता भारत, ब्रेक कौन लगाएगा?

 

यदि आप भारत में हैं तो आप कानून को ठेंगे पर रख सकते हैं. किसी को भी सडक चलते पीट सकते हैं, पिट सकते हैं. कहीं भी पेशाब कर सकते हैं, कहीं भी थूक सकते हैं. कहीं भी अपना वाहन खडा कर सकते हैं. क्योंकि भारत में राम  राज आ चुका है. छोटे मोटे कानून तो आपके खिलाफ इस्तेमाल ही नहीं हो सकते. यहाँ तक कि आप किसी भी मंत्री को, नेता को जान से मारने की धमकी आसानी से दे सकते हैं.

ताजा खबर है कि केंद्रीय रक्षा राज्यमंत्री और रांची के सांसद संजय सेठ को जान से मारने की धमकी मिली है। शुक्रवार को फोन करके उन्हें

धमकी दी गई है ।धमकी देने वाले का पता नहीं चला है। फिलहाल पुलिस इसका पता लगा रही है।

केंद्रीय मंत्री और रांची से सांसद संजय सेठ को जान से मारने की धमकी मिलने के बाद सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस को सूचना मिलने के बाद हड़कंप मच गया। पुलिस ने तुरंत ऐक्शन लेते हुए जांच शुरू कर दी है। धमकी देने वाले आरोपी की तलाश की जा रही है।संजय सेठ रांची से भारतीय जानता पार्टी के संसद हैं. साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की थी. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने दोबारा जीत दर्ज की. इसका इनाम उन्हें मंत्रीपद के रूप में मिला. 

सेठ तो सेठ ठहरे मप्र विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रह चुके डॉ गोविन्द सिंह को भी किसी ने फोन कर जान से मारने की धमकी दे डाली. मप्र पुलिस भी इस धमकी को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं है. पूरे देश में यही आलम है. आप दो पक्षों के बीच सरेराह होने वाले झगडे में बीचबचाव नहीं कर सकते. ग्वालियर में एक ऐसे ही मामले में गुंडों ने एक हैडकानेस्टबल का सिर फोड दिया. एक सब इंसपेक्टर ने भोपाल में दो लडकियों के साथ सरेआम अभद्रता की, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

हमारे यहां कानून का कोई इकबाल नहीं. हमारी सरकार, हमारी शिक्षा पद्यतिपिछले आठ दशक में आम आदमी को सडक पर बांयी तरफ चलना नहीं सिखा पायी, ऊपर से तुर्रा ये कि हम विश्व गुरु बनने वाले हैं.

देखने में बात बहुत हलकी लगती है लेकिन है बहुत बडी. बडी इसलिए कि ये छोटे छोटे कानूनों की अनदेखी हमें लगातार असभ्य बना रही है. इसी से घबडाकर सालाना दो लाख से अधिक भारतीय विदेशों की नागरिकत ले रहे हैं. किंतु सरकार को, भाजपा को और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कोई परवाह नहीं. उन्हे तो हिंदू राष्ट्र बनाना है, भले ही देश अराजक हालात में पहुंच जाए.

मेरी पक्की धारणा है कि हम भारतीय शायद ही सभ्य हो पाएंगे. असभ्यता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. कानून का मान मर्दन हमारे लिए मात्र मनोरंजन है. मनोरंजन के सिवा कुछ नहीं.

महाराष्ट्र में आप हिंदी न बोलने पर पीटे जा सकते हैं. मराठियों के बारे में बोलने पर बडबोले निशिकांत दुबे को भी महाराष्ट्र आने पर पीटने की धमकी दी जा सकती है. संघ प्रमुख जब खुद डर के भीतर अपने आप को असुरक्षित समझते हैं. वे सार्वजनिक रूप से डर की बात कह चुके हैं. बिहार में एक के बाद हत्या की वारदात हो चुकी हैं लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं है. बदलाव नही है.

प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रव्यापी स्वच्छता अभियान चलवाया, 12करोड से ज्यादा घरों में शौचालय बनवा दिए लेकिन नतीजा सिफर है. वजह है हमारी मानसिकता, हमारी दंडप्रणाली. हम कचरा फेंकने, सडक किनारे पेशाब या शौच करने या सार्वजनिक स्थानों पर थूकने या धूम्रपान करने को अपराध मानते ही नहीं, हालांकि हमारे कानून के अनुसार ये सब दंडनीय अपराध हैं.

विदेश से स्वदेश की धरती पर पांव रखते ही हमें गंदगी के दर्शन हो जाते है. हवाई अड्डे के बाहर निकलते ही गंदगी और दुर्गंध हमारा स्वागत करती है. सडकों के दोनों और खडी खरपतवार और गंदगी के ढेर हमारे सौंदर्यबोध का मुजाहिरा करते हैं. इस सबके लिए अकेले मोदीजी जिम्मेदार नहीं हैं. नेहरू भी जिम्मेदार हैं, इंदिरा गांधी भी जिम्मेदार हैं.हम सब जिम्मेदार हैं.पुलिस, अदालत, स्थानीय निकाय, स्कूल, सब इस अराजकता के लिए दोषी हैं. ईश्वर से प्रार्थना है कि वो हमारे जन प्रतिनिधियों की रक्षा करे धमकीबाजों से.

@ राकेश अचल

शनिवार, 26 जुलाई 2025

रिकार्ड तोड मोदी के लिए नेहरू अब भी चुनौती !

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं और पीछे उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी. मोदी जी ने श्रीमती इंदिरा गाँँधी के शासन का रिकार्ड पार कर लिया लेकिन वे पूरा कस-बल लगाकर भी न नेहरू जितनी कीर्ति अर्जित कर पाए और न नेहरू जितना शासन कर पाए. नेहरू ने सत्ता के साथ देश और दुनिया के दिलों पर भी शासन किया था.मोदी जी को सत्ता में रहते हुए 11 साल और 60 दिन पूरे हो चुके हैं। इस तरह उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक और रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। पीएम मोदी अब सिर्फ जवाहरलाल नेहरू से पीछे चल रहे हैं जिन्होंने लगातार 16 साल 286 दिन तक प्रधानमंत्री की कुर्सी अपने पास रखी थी।

वैसे यह जरूर है कि दोनों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने चार बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन इतना फर्क जरूर रहा कि नेहरू लगातार जीतते रहे और सत्ता पर काबिज रहे, वहीं इंदिरा गांधी को आपातकाल के बाद कुछ समय के लिए अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी।लेकिन बात अगर  प्रधानमंत्री शपथ लेने की आएगी तो प्रधानमंत्री मोदी अभी भी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से पीछे चल रहे हैं क्योंकि नेहरू और इंदिरा ने चार बार पीएम पद की शपथ ली है, ऐसे में अभी पीएम मोदी को एक बार फिर पीएम पद की शपथ लेनी होगी।वैसे इस मामले में मोदी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के पीछे चल रहे हैं, 

मोदीजी को नेहरू और इंदिरा गांधी से बडा नेता बताने वाले उनके समर्थक रिकार्ड बनाने और कीर्ति अर्जित करने के भेद को समझ नही पा रहे.कई मामलों में उन्होंने उन दोनों को भी पीछे छोड़ दिया है। मोदी जी ने देश की आजादी की लडाई नहीं लडी. वे आपातकाल में भी जेल नहीं गये जबकि नेहरू ने टुकडों में 13साल जेलों में बिताये. उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने भी जेल यात्राएं की.

हाँ मोदीजी पिछले 24 साल से सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं और लगातार चुनाव जीतते हुए आ रहे हैं।वे 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और फिर उसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली।मुमकिन है कि उन्हे जेल यात्रा पद से हटने के बाद करने का योग हो.

ये  सही है कि मोदी  पहले गैर कांग्रेसी नेता हैं जिन्होंने लगातार दो कार्यकाल अपने पूरे किए हैं। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी भी भाजपा नेता थे लेकिन उनका कार्यकाल सिर्फ 6 साल का रहा लेकिन अटल जी ने तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, इसलिए मोदी जी का ये रिकार्ड भी बेकार गया.

मोदीजी को नेहरू और इंदिरा के बराबर खडा करने की कोशिश करने वाले भूल जाते हैं कि नेहरू और इंदिरा गांधी ने कभी बैशाखियों के सहारे कोई सरकार नहीं चलाई. इन दोनों के कार्यकाल में कभी 80 करोड लोग रोटी के लिए सरकार के मोहताज नहीं बने. इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान को तोडकर बांग्लादेश बनवाया लेकिन मोदी ने 2019  में इंदिरा गांधी की बराबरी करने की सनक में क्शमीर के ही तीन टुकड़े कर दिए, जो आज भी राज्य बनने के लिए तडप रहे हैं. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है.

नेहरू और गांधी ने कभी डबल इंजन लगाकर राज्य सरकारें नहीं चलाईं किंतु मोदी जी को मजबूरन एक के पीछे एक इंजन लगाना पडा. हाँ मोदी जी ने दुनिया के 25 देशों के नागरिक सम्मान जरूर हासिल किए लेकिन नेहरू और इंदिरा गांधी अपने ही देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेकर संतुष्ट रहे. मोदीजी को अब इस दिशा में मेहनत करना पडेगी, अन्यथा ब पिता-पुत्री का मुकाबला कैसे कर पाएंगे.

पिता -पुत्री की जोडी की बराबरी करना मोदी जी के लिए कदाचित आसान है भी नही.जैसे नेहरूजी 75 साल के होते ही परलोक चले गये. इंदिरा गांधी ने सत्ता में रहते हुए शहादत दी. इस रिकार्ड की बराबरी मोदी जी को भूलकर भी नहीं करना चाहिए, अन्यथा उनके शुभचिंतक उन्हे पानी पर चढा सकते है.नेहरू और इंदिरा गांधी ने दुश्मन के खिलाफ सीधे लडाई लडी जबकि मोदी जी सर्जीकल स्ट्राइक और आपरेशन सिंदूर से आगे नहीं बढ पाए. नेहरू और इंदिरा गांधी के समय में दुनिया के किसी भी देश ने ये दावा नहीं किया कि कोई युद्ध बंदी या सीजफायर उसने कराई है्.किंतु तीन दिन के आपरेशन सिंदूर के बाद सीजफायर को लेकर अमरीका के राष्ट्रपति दो दर्जन बार दावे कर चुके हैं.

ये सच है कि नेहरू और इंदिरा गांधी भारत को दुनिया की चौथी बडी अर्थव्यवस्था नही बना पाए लेकिन मोदीजी ने बना दिया. इसके लिए उन्हें बधाई दी जा सकती है, किंतु इससे भारत को मिला क्या? भारत के पास जो था, वो अस्मिता, संप्रभुता, समरसता, सब जख्मी हो चुकी है. मोदीजी के नेतृत्व में न देश हिंदू बन सका और न जैसा था वैसा रह सका. मोदीजी द्वारा बनाए गये तमाम रिकार्ड देश के लिए कितने फायदेमंद हैं इसका आकलन मोदीजी के बाद ही होगा. अभी तो जितने भी प्रयास हैं वे 'अहो रूपम, अहो ध्वनि'की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं

.मोदीजी का जो असल रिकॉर्ड है उसका जिक्र किसी ने नहीं किया.मोदीजी के कार्यकाल में आजादी के बाद का सबसे बडा ककिसान आंदोलन हुआ. 750 किसान मरे.मोदी के राज में सबसे ज्यादा सांसद निलंबित हुए, सबसे ज्यादा असंवैधानिक इलेक्टोरल बांड से चुनावी चंदा वसूल किया गया. सबसे ज्यादा उद्योगपति देश का धन लेकर विदेश भागे. सबसे ज्यादा कालाधन मोदीजी के राज में बढा. सबसे ज्यादा समय तक मणिपुर जला लेकिन मोदीजी वहां कभी नहीं गये. मोदीजी का ही रिकॉर्ड है कि संसद के चलते एक उप राष्ट्रपति ने इस्तीफा दिया. लेकिन इन रिकार्ड्स से मोदीजी की कीर्ति नहीं बढी उलटे बदनामी ही हुई. मोदी जी का सबसे बडा रिकॉर्ड ये है कि उन्होने एक भी पत्रकार वार्ता में हिस्सा नहीं लिया.बहरहाल मोदीजी को शासन करने में इंदिरा गांधी से आगे निकलने पर बधाइयाँ. वे नेहरू का भी रिकॉर्ड तोडें, पुतिन का भी तोडें, शी जिन पिंग का भी तोडें, साथ ही देश की कीर्ति भी बढाएं. रिकार्ड तो हमारे खिलाडी खेल, खेल में तोड देते हैं.

@ राकेश अचल

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

बौद्ध देशों के बीच जंग क्योंकि धर्म से बडी है संप्रभुता

दुनिया के प्रमुख बौद्ध धर्मावलंबी देश थाइलेंड और कंबोडिया के बीच जंग की खबरों से मै हतप्रभ हूँ और ये  जानने में लगा हूँ कि मजहब और संप्रभुता में महत्वपूर्ण मजहब है या जंग? उत्तर मिलता है संप्रभुता, मजहब से बडी चीज है. यदि आप संप्रभु नहीं हैं तो भी समानधर्मी होने का कोई मोल नहीं है.थाईलैंड और कंबोडिया के बीच तनाव चरम पर हैं। अब थाईलैंड ने कंबोडिया पर F-16 फाइटर जेट के जरिए बमबारी की है।  रॉयटर्स ने थाईलैंड आर्मी के हवाले से बताया कि थाईलैंड – कंबोडिया की सीमा पर थाईलैंड द्वारा तैनात किए गए छह F-16 फायटर जेट्स में से एक ने गुरुवार को कंबोडिया पर बम गिराए और एक मिलिट्री टारगेट को नष्ट कर दिया।

संयोग से मै अपनी यायावरी प्रवृति के चलते थाईलेंड भी गया हूं और कंबोडिया भी. दोनों देशों में बुद्ध विराजमान हैं लेकिन एक देश भुखमरी का शिकार है तो एक देश में जिस्मफरोशी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है. फिर भी दोनों देश अपने -अपने देश की संप्रभुता के लिए जंग से नहीं हिचके.

गुरुवार सुबह इन दोनों ही बौद्ध देशों ने एक-दूसरे पर हमला करने के आरोप लगाए। थाईलैंड आर्मी की डिप्टी स्पोक्स पर्सन ऋचा सुक्सुवानोन ने बताया कि उन्होंने योजना के मुताबिक मिलिट्री टारगेट्स के खिलाफ हवाई ताकत का इस्तेमाल किया है।जबकि कंबोडिया की डिफेंस मिनिस्ट्री ने बताया कि थाईलैंड के विमानों ने सड़क पर बम गिराए। उन्होंने कहा कि वे “कंबोडिया की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध थाईलैंड के लापरवाह और क्रूर सैन्य आक्रमण की कड़ी निंदा करते हैं।”

आपको बता दें कि कंबोडिया की अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है, जो मुख्य रूप से कृषि, विनिर्माण (विशेषकर कपड़ा), पर्यटन और निर्माण जैसे क्षेत्रों पर निर्भर है। 2023 के आंकड़ों के आधार पर, कंबोडिया की जीडीपी लगभग 31.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी, और यह निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था के रूप में वर्गीकृत है। 

गरीबी और असमानता: हालांकि गरीबी दर में कमी आई है, ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी एक चुनौती है।

 यहां की अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजारों (विशेषकर कपड़ा निर्यात) और विदेशी निवेश पर बहुत अधिक निर्भर है। भ्रष्टाचार, सीमित कानूनी सुधार और कुशल श्रम की कमी विकास में बाधा डालती है.वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे कृषि और पर्यटन को प्रभावित कर सकते हैं।यहाँ आज भी लोगों के पास भरपेट अन्न नहीं है. लोग कीडे मकोडों को खाने पर मजबूर हैं किंतु देश की संप्रभुता पर हमला किसी को बर्दास्त नहीं है.

थाईलैंड और कंबोडिया अपनी 817 किलोमीटर लंबी बॉर्डर साझा करते हैं. एक शताब्दी  से भी अधिक समय से दोनों देश अपनी सीमा पर अचिन्हित क्षेत्र पर नियंत्रण को लेकर संघर्षरत हैं। इस वजह से कई वर्षों से झड़पें हो रही हैं और इन झड़पों में कम से कम एक दर्जन मौतें हो चुकी हैं। इनमें साल 2011 में एक हफ्ते तक चली आर्टिलरी फायरिंग भी शामिल है। इस साल मई में विवाद तब फिर से बढ़ गया, जब दोनों देशों की सेनाओं के बीच फायरिंग हुई और कंबोडिया के एक सैनिक की मौत हो गई। इस वजह से राजनयिक संकट भी पैदा हो गया।लेकिन भगवान बुद्ध का दर्शन यहाँ काम नहीं आ रहा.

ताजा स्थिति ये है कि दोनों बौद्ध देशों के बीच तनाव तब और ज्यादा गहरा गया, जब थाईलैंड ने कंंबोडिया से अपना राजदूत वापस बुला लिया और कहा कि वो कंबोडिया के राजदूत को वापस भेज देंगे। इससे पहले थाईलैंड ने कंबोडिया पर आरोप लगाया कि उसने विवाद वाले इलाके में लैंड माइन बिछाई हुई हैं, जिससे एक हफ्ते के भीतर दूसरे थाई सैनिक ने अपने अंंग खो दिए। थाईलैंड का कहना है कि कंबोडिया से टकराव में उसके नौ नागरिकों मारे जा चुके हैं। कंबोडिया का कहना है कि जिन लैंड माइन्स की बात थाईलैंड कर रहा है, वो दशकों पर सिविल वार के समय की हैं। हालांकि थाईलैंड मानता है कि सीमावर्ती एरिया में ये लैंडमाइन हाल में बिछाए गए हैं।

अब आपको बता दें कि थाईलेंड  में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आय में बड़ा अंतर है।हाल के दशकों में राजनीतिक उथल-पुथल ने निवेश और विकास को प्रभावित किया है।थाईलैंड की जनसंख्या तेजी से वृद्ध हो रही है, जिससे श्रम बल और सामाजिक कल्याण पर दबाव बढ़ रहा है।

हालांकि थाईलैंड दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातकों में से एक है। रबर, गन्ना, और कैसावा भी महत्वपूर्ण हैं। कृषि में लगभग 30  प्रतिशत कार्यबल  है, लेकिन यह जीडीपी में केवल 8-10प्रतिशत योगदान देता है।थाईलैंड "एशिया का डेट्रॉयट" के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यह टोयोटा, होंडा जैसे ब्रांडों के लिए प्रमुख ऑटोमोबाइल उत्पादन केंद्र है।पर्यटन थाईलैंड की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है, जो जीडीपी में 12-15 प्रतिशत योगदान देता है। बैंकॉक, फुकेत,  चियांग माई जैसे पर्यटन स्थल  पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

ये एक कडवी हकीकत है कि चाहे इस्लामिक देश हों चाहे ईसाइयत को मानने वाले देश. चाहे बौद्ध धर्म को मानने वाले देश हों चाहे हिंदू धर्म को मानने वाले देश. संप्रभुता पर संकट आते ही एक-दूसरे के दुश्मन हो जाते हैं. मुझे उम्मीद है कि अंकोरवाट में विराजे भगवान विष्णु तथा और कंबोडिया में विराजे भगवान बुद्ध इस युद्ध को लंबा नहीं चलने देंगे. दोनों को बुद्ध की शरण में ही शांति मिलेगी अन्यथा हथियारों के सौदागर तो दुनिया में कहीं भी शांति चाहते ही कहाँ हैं.

@ राकेश अचल 


Featured Post

वन परिक्षेत्र अधिकारी जतारा की लगातार दो दिन में दो बड़ी कार्यवाहियां

  28/08/2025 को विद्युत करंट से मृत नीलगाय के  आरोपी को जेल पहुंचाने के बाद 30/08/2025 को रेत परिवहन में जप्त किए गए दो ट्रैक्टर  बीट कछोरा ...